नमस्कार मित्रों! ६ अप्रैल 2013 शनिवार को रात 10 बजे सब टीवी के
कार्यक्रम “वाह वाह क्या बात है” में आप मेरा काव्यपाठ अवश्य
देखें/सुनें..उक्त तिथि को .मैं बाराबंकी के मुशायरे में शिरकत करने की वज़ह
से अपना कार्यक्रम नहीं देख पाऊँगी अतः आप देखकर अपनी अमुल्य
प्रतिक्रियाओं और सुझावों से मेरा उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन करें..आभार
नाम मेरा 'किरण' है ऐ साहिब!मेरे अंदर मेरा उजाला है-डॉ.कविता"किरण" I AM LIGHT OF LOVE,LET ME SPREAD IN YOUR HEART AND YOUR LIFE-Dr.kavita'kiran'
Thursday, April 4, 2013
Friday, February 22, 2013
मुहब्बत का ज़माना आ गया है ....
मुहब्बत का ज़माना आ गया है
गुलों को मुस्कुराना आ गया है
नयी शाखों पे देखो आज फिर वो
नज़र पंछी पुराना आ गया है
जुनूं को मिल गयी है इक तसल्ली
वफाओं का खज़ाना आ गया है
उन्हें भी आ गया नींदे उडाना
हमें भी दिल चुराना आ गया है
छुपाया था जिसे हमने हमी से
लबों पर वो फ़साना आ गया है
नज़र से पी रहे हैं नूर उसका
संभलकर लडखडाना आ गया है
मुहब्बत तो सभी करते हैं लेकिन
हमें करके निभाना आ गया है
हमें तो मिल गया महबूब का दर
हमारा तो ठिकाना आ गया है
हम अपने आईने के रु-ब-रु हैं
निशाने पर निशान आ गया है
अँधेरा है घना हर और तो क्या
"किरण"को झिलमिलाना आ गया है
नज़र पंछी पुराना आ गया है
जुनूं को मिल गयी है इक तसल्ली
वफाओं का खज़ाना आ गया है
उन्हें भी आ गया नींदे उडाना
हमें भी दिल चुराना आ गया है
छुपाया था जिसे हमने हमी से
लबों पर वो फ़साना आ गया है
नज़र से पी रहे हैं नूर उसका
संभलकर लडखडाना आ गया है
मुहब्बत तो सभी करते हैं लेकिन
हमें करके निभाना आ गया है
हमें तो मिल गया महबूब का दर
हमारा तो ठिकाना आ गया है
हम अपने आईने के रु-ब-रु हैं
निशाने पर निशान आ गया है
अँधेरा है घना हर और तो क्या
"किरण"को झिलमिलाना आ गया है
-डॉ कविता"किरण"
Friday, December 21, 2012
उस दिन के लिए तैयार रहना..तुम!!!!
तुम पूरी कोशिश करते हो
मेरे दिल को दुखाने की
मुझे सताने की
रुलाने की
और इसमें पूरी तरह कामयाब भी होते हो---
सुनो!
मेरे आंसू तुम्हे
बहुत सुकून देते हैं ना!
तो लो..
आज जी भर के सता लो मुझे
देखना चाहते हो ना !
मेरी सहनशक्ति की सीमा!!
तो लो..
आज जी भर के
आजमा लो मुझे
और मेरे सब्र को
पर हाँ!
फिर उस दिन के लिए तैयार रहना
कि जिस दिन
मेरे सब्र का बाँध टूटेगा
और बहा ले जायेगा तुम्हे
तुम्हारे अहंकार सहित
इतनी दूर तक--
कि जहाँ तुम
शेष नहीं बचोगे
मुझे सताने के लिए
मेरा दिल दुखाने के लिए
मुझे आजमाने के लिए
पड़े होंगे पछतावे और
और बहा ले जायेगा तुम्हे
तुम्हारे अहंकार सहित
इतनी दूर तक--
कि जहाँ तुम
शेष नहीं बचोगे
मुझे सताने के लिए
मेरा दिल दुखाने के लिए
मुझे आजमाने के लिए
पड़े होंगे पछतावे और
शर्मिंदगी की रेत पर कहीं
अपने झूठे दम्भ्साहित
एकदम अकेले--
उस दिन के लिए
तैयार रहना--
तुम !-
अपने झूठे दम्भ्साहित
एकदम अकेले--
उस दिन के लिए
तैयार रहना--
तुम !-
----डॉ कविता"किरण"---
Sunday, November 11, 2012
बेवफा बावफा हुआ कैसे..........
बेवफा बावफा हुआ कैसे
ये करिश्मा हुआ भला कैसे
वो जो खुद का सगा न हो पाया
हो गया है मेरा सगा कैसे
जब नज़रिए में नुक्स हो साहिब
तो नज़र आएगा ख़ुदा कैसे
सो गया हो ज़मीर ही जिसका
वो किसी का करे भला कैसे
तूने बख्शा नहीं किसी को जब
माफ़ होगी तेरी ख़ता कैसे
जब कफस में नहीं था दरवाज़ा
फिर परिंदा हुआ रिहा कैसे
कितने हैरान हैं महल वाले
कोई मुफ़लिस यहाँ हंसा कैसे
चाँद मेहमान है अंधेरों का
चुप रहेगी 'किरण' बता कैसे
कविता'किरण'
Friday, September 28, 2012
मुक़द्दर से न अब शिकवा करेंगे........
मुक़द्दर से न अब शिकवा करेंगे
न छुप छुपके सनम रोया करेंगे
दयारे-यार में लेंगे पनाहें
दरे-मह्बूब पर सजदा करेंगे
हमीं ने ग़र शुरू की है कहानी
हमीं फिर ख़त्म ये किस्सा करेंगे
जिसे ढूँढा ज़माने भर में हमने
कहीं वो मिल गया तो क्या करेंगे
कहा किसने ये तुमसे उम्र-भर हम
तुम्हारी याद में तडपा करेंगे
न छुप छुपके सनम रोया करेंगे
दयारे-यार में लेंगे पनाहें
दरे-मह्बूब पर सजदा करेंगे
हमीं ने ग़र शुरू की है कहानी
हमीं फिर ख़त्म ये किस्सा करेंगे
जिसे ढूँढा ज़माने भर में हमने
कहीं वो मिल गया तो क्या करेंगे
कहा किसने ये तुमसे उम्र-भर हम
तुम्हारी याद में तडपा करेंगे
न होगा हमसे अब ज़िक्रे-मुहब्बत
वफ़ा के नाम से तौबा करेंगे
खता हमसे हुयी आखिर ये कैसे
अकेले बैठकर सोचा करेंगे
कि इस तर्के-तआलुक़ का सितमगर
किसी से भी नहीं चर्चा करेंगे
हयाते- राह में सोचा नहीं था
हमारे पाँव भी धोखा करेंगे
ज़माना दे'किरण'जिसकी मिसालें
क़लम में वो हुनर पैदा करेंगे
-कविता'किरण'
वफ़ा के नाम से तौबा करेंगे
खता हमसे हुयी आखिर ये कैसे
अकेले बैठकर सोचा करेंगे
कि इस तर्के-तआलुक़ का सितमगर
किसी से भी नहीं चर्चा करेंगे
हयाते- राह में सोचा नहीं था
हमारे पाँव भी धोखा करेंगे
ज़माना दे'किरण'जिसकी मिसालें
क़लम में वो हुनर पैदा करेंगे
-कविता'किरण'
Friday, July 6, 2012
सितारे टूटकर गिरना हमें अच्छा नहीं लगता ....
सितारे टूटकर गिरना हमें अच्छा नहीं लगता
गुलों का शाख से झरना हमें अच्छा नहीं लगता
सफ़र इस जिंदगी का यूँ तो है अँधा सफ़र लेकिन
उमीदें साथ हैं वरना हमें अच्छा नहीं लगता
थे ताज़ा जब तलक हमको किसी की याद आती थी
पुराने ज़ख्म का भरना हमें अच्छा नहीं लगता
हमारा नाम भी शामिल हो अब बेखौफ बन्दों में
जहाँ से इस कदर डरना हमें अच्छा नहीं लगता
मुहब्बत हम करें तेरी इबादत सोचना भी मत
तुम्हारा ज़िक्र भी करना हमें अच्छा नहीं लगता
भला हो या बुरा अब चाहे जो होना है हो जाये
''किरण" ये रोज़ का मरना हमें अच्छा नहीं लगता
*********
डॉ कविता 'किरण''
Sunday, May 20, 2012
मिलता नहीं है कोई भी गमख्वार की तरह.....
पेश आ रहे हैं यार भी अय्यार की तरह
मुजरिम तुम्ही नहीं हो फ़क़त जुर्म-ए-इश्क के
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह
वादों का लेन-देन है, सौदा है, शर्त है
मिलता कहाँ है प्यार भी अब प्यार की तरह
ता-उम्र मुन्तज़िर ही रहे हम बहार के
इस बार भी न आई वो हर बार की तरह
अहले-जुनूं कहें के उन्हें संग-दिल कहें
मातम मना रहे हैं जो त्यौहार की तरह
यादों के रोज़गार से जब से मिली निजात
हर रोज़ हमको लगता है इतवार की तरह
पैकर ग़ज़ल का अब तो 'किरण' हम को कर अता
बिखरे हैं तेरे जेहन में अश'आर की तरह
************************
-कविता'किरण'.
************************
-कविता'किरण'.
Tuesday, May 1, 2012
मत समझिये कि मैं औरत हूँ, नशा है मुझमें....
मत समझिये कि मैं औरत हूँ, नशा है मुझमें
माँ भी हूँ, बहन भी, बेटी भी, दुआ है मुझमे
हुस्न है, रंग है, खुशबू है, अदा है मुझमे
मैं मुहब्बत हूँ, इबादत हूँ, वफ़ा है मुझमे
कितनी आसानी से कहते हो कि क्या है मुझमें
ज़ब्त है, सब्र-सदाक़त है, अना है मुझमें
मैं फ़क़त जिस्म नहीं हूँ कि फ़ना हो जाऊं
आग है , पानी है, मिटटी है, हवा है मुझमे
इक ये दुनिया जो मुहब्बत में बिछी जाये है
एक वो शख्स जो मुझसे ही खफा है मुझमे
अपनी नज़रों में ही क़द आज बढ़ा है अपना
जाने कैसा ये बदल आज हुआ है मुझमें
दुश्मनों में भी मेरा ज़िक्र ‘किरण’ है अक्सर
बात कोई तो ज़माने से जुदा है मुझमें
********************************Kavita"kiran"
Sunday, April 1, 2012
कलेजा मुंह को ए सरकार आया.......

कलेजा मुंह को ए सरकार आया
है मुट्ठी में दिले-बेज़ार आया
हुआ इस दौर में दुश्वार जीना
ये दिल सजदे में साँसे हार आया
मेरे इज़हार के बदले में या रब!
तेरी जानिब से बस इन्कार आया
ख़ता मैं हूँ ख़ुदा तू है मुआफी
तेरे दम से ही बेड़ा पार आया
जिन्हें परहेज था मेरे सुख़न से
उन्हें ही आज मुझ पर प्यार आया
"किरण" जो भी गया तुझको मिटाने
वो जानो-दिल तुझ ही पे वार आया
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कविता'किरण'
है मुट्ठी में दिले-बेज़ार आया
हुआ इस दौर में दुश्वार जीना
ये दिल सजदे में साँसे हार आया
मेरे इज़हार के बदले में या रब!
तेरी जानिब से बस इन्कार आया
ख़ता मैं हूँ ख़ुदा तू है मुआफी
तेरे दम से ही बेड़ा पार आया
जिन्हें परहेज था मेरे सुख़न से
उन्हें ही आज मुझ पर प्यार आया
"किरण" जो भी गया तुझको मिटाने
वो जानो-दिल तुझ ही पे वार आया
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कविता'किरण'
Thursday, March 1, 2012
वत्सला से वज्र में ढल जाऊंगी, मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊंगी....

वत्सला से वज्र में ढल जाऊंगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊंगी
दंभ के आकाश को छल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
पतझरों की पीर की पाती सही
वेदना के वंश की थाती सही
कल मेरा स्वागत करेगा सूर्योदय
आज दीपक की बुझी बाती सही
फिर स्वयं के ताप से जल जाऊँगी
मैं नही हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
मन मरुस्थल नेह निर्जल ताल है
रूप दिनकर का हुआ विकराल है
है विकल विश्वास विचलित प्राण हैं
कामना की देह सूखी डाल है
नीर-निश्चय से पुनः फल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
आत्म-बल का मै अखंडित जाप हूँ
प्रेरणा के गीत का आलाप हूँ
अपने स्वाभिमान की हूँ सारथी
स्वयंसिद्धा अपना परिचय आप हूँ
पुरुष की प्रभुताओं को खल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
सभ्यता मुझसे है मैं हूँ संस्कृति
आत्म गौरव की हूँ अनुपम आकृति
अपनी आभा का मुझे आभास है
लय हूँ जीवन की समय की हूँ गति
पीर के आँचल में भी पल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
तज के अब नारीत्व के संत्रास को
मैं रचूँगी इक नए इतिहास को
एक मंगल भोर का आव्हान कर
प्राण में भर लूँगी हर्ष-उल्लास को
भाल पर तम के 'किरण' मल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
---------------------------
गीत संग्रह 'ये तो केवल प्यार है' में से
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊंगी
दंभ के आकाश को छल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
पतझरों की पीर की पाती सही
वेदना के वंश की थाती सही
कल मेरा स्वागत करेगा सूर्योदय
आज दीपक की बुझी बाती सही
फिर स्वयं के ताप से जल जाऊँगी
मैं नही हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
मन मरुस्थल नेह निर्जल ताल है
रूप दिनकर का हुआ विकराल है
है विकल विश्वास विचलित प्राण हैं
कामना की देह सूखी डाल है
नीर-निश्चय से पुनः फल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
आत्म-बल का मै अखंडित जाप हूँ
प्रेरणा के गीत का आलाप हूँ
अपने स्वाभिमान की हूँ सारथी
स्वयंसिद्धा अपना परिचय आप हूँ
पुरुष की प्रभुताओं को खल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
सभ्यता मुझसे है मैं हूँ संस्कृति
आत्म गौरव की हूँ अनुपम आकृति
अपनी आभा का मुझे आभास है
लय हूँ जीवन की समय की हूँ गति
पीर के आँचल में भी पल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
तज के अब नारीत्व के संत्रास को
मैं रचूँगी इक नए इतिहास को
एक मंगल भोर का आव्हान कर
प्राण में भर लूँगी हर्ष-उल्लास को
भाल पर तम के 'किरण' मल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
---------------------------
गीत संग्रह 'ये तो केवल प्यार है' में से
Wednesday, February 1, 2012
तेरे बारे में सबसे पूछूं हूँ....

तेरे बारे में सबसे पूछूं हूँ
तू है मुझमे तुझी को खोजूं हूँ
है नज़र तू ही तू नज़ारा भी
हर तरफ सिर्फ तुझको देखूं हूँ
मेरा चेहरा चमक उठे जानम
तेरे बारे मे जब भी सोचूं हूँ
तेरे दीदार को है बेकाबू
बडी मुश्किल से दिल को रोकू हूँ
ख़त लिखूं हूँ तुझे ख़यालों में
और खयालों में तुझको भेजू हूँ
बेख़ुदी का मेरी ये आलम है
तू कहां है तुझी से पुछूं हूँ
मुझको तुझसे ही कब मिली फुरसत
अपने बारे में कब मैं सोचूं हूँ
मौत को जी रही हूँ मैं पल पल
यूँ मज़े जिंदगी के लूटूं हूँ
मैं ‘किरण’ उसकी याद का स्वेटर
कभी खोलूं कभी समेटूं हूँ
********
कविता'किरण'
तू है मुझमे तुझी को खोजूं हूँ
है नज़र तू ही तू नज़ारा भी
हर तरफ सिर्फ तुझको देखूं हूँ
मेरा चेहरा चमक उठे जानम
तेरे बारे मे जब भी सोचूं हूँ
तेरे दीदार को है बेकाबू
बडी मुश्किल से दिल को रोकू हूँ
ख़त लिखूं हूँ तुझे ख़यालों में
और खयालों में तुझको भेजू हूँ
बेख़ुदी का मेरी ये आलम है
तू कहां है तुझी से पुछूं हूँ
मुझको तुझसे ही कब मिली फुरसत
अपने बारे में कब मैं सोचूं हूँ
मौत को जी रही हूँ मैं पल पल
यूँ मज़े जिंदगी के लूटूं हूँ
मैं ‘किरण’ उसकी याद का स्वेटर
कभी खोलूं कभी समेटूं हूँ
********
कविता'किरण'
Thursday, December 1, 2011
जब जब आंख में आंसू आए

जब जब आंख में आंसू आए
तब तब लब ज्यादा मुस्काए
नहीं संभाला उसने आकर
हम ठोकर खाकर पछताए
कितने भोलेपन में हमने
इक पत्थर पे फूल चढाए
चाहत के संदेसों संग अब
रोज कबूतर कौन उडाए
नाम किसी का अपने दिल पर
कौन लिखे और कौन मिटाए
वो था इक खाली पैमाना
देख जिसे मयकश ललचाए
वक्त बदल ना पाये अपना
खुद को ही अब बदला जाए
कुछ तो दुनियादारी सीखो
कौन ‘किरण’ तुमको समझाए
---कविता‘किरण’
तब तब लब ज्यादा मुस्काए
नहीं संभाला उसने आकर
हम ठोकर खाकर पछताए
कितने भोलेपन में हमने
इक पत्थर पे फूल चढाए
चाहत के संदेसों संग अब
रोज कबूतर कौन उडाए
नाम किसी का अपने दिल पर
कौन लिखे और कौन मिटाए
वो था इक खाली पैमाना
देख जिसे मयकश ललचाए
वक्त बदल ना पाये अपना
खुद को ही अब बदला जाए
कुछ तो दुनियादारी सीखो
कौन ‘किरण’ तुमको समझाए
---कविता‘किरण’
Sunday, November 13, 2011
मोमिन औ' दाग़ औ'ग़ालिब की ग़ज़ल-सी लड़की....
मोमिन औ' दाग़ औ'ग़ालिब की ग़ज़ल-सी लड़की
चांदनी रात में इक ताजमहल-सी लड़की
जिंदा रहने को ज़माने से लड़ेगी कब तक
झील के पानी में शफ्फाफ़ कँवल-सी लड़की
कोख़ को कब्र बना डाला जब इक औरत ने
कट गयी पकने से पहले ही फसल-सी लड़की
बेटी होना है ज़माने में गुन्हा क्या कोई
घिर गयी सख्त सवालों में सरल-सी लड़की
नर्म हाथों पे नसीहत के धरे अंगारे
चाँद छूने को गयी जब भी मचल-सी, लड़की
अपनी सांसों का सफ़रनामा शुरू से पहले
अपने अंजाम से जाती है दहल-सी, लड़की
बेटियां खूब दुआओं से मिला करती हैं
कौन कहता है ख़ुशी में है खलल-सी, लड़की
इतना कहना है "किरण" आज के माँ-बापों से
बोझ समझो न है अल्लाह के फज़ल-सी, लड़की
***********
कविता'किरण'
चांदनी रात में इक ताजमहल-सी लड़की
जिंदा रहने को ज़माने से लड़ेगी कब तक
झील के पानी में शफ्फाफ़ कँवल-सी लड़की
कोख़ को कब्र बना डाला जब इक औरत ने
कट गयी पकने से पहले ही फसल-सी लड़की
बेटी होना है ज़माने में गुन्हा क्या कोई
घिर गयी सख्त सवालों में सरल-सी लड़की
नर्म हाथों पे नसीहत के धरे अंगारे
चाँद छूने को गयी जब भी मचल-सी, लड़की
अपनी सांसों का सफ़रनामा शुरू से पहले
अपने अंजाम से जाती है दहल-सी, लड़की
बेटियां खूब दुआओं से मिला करती हैं
कौन कहता है ख़ुशी में है खलल-सी, लड़की
इतना कहना है "किरण" आज के माँ-बापों से
बोझ समझो न है अल्लाह के फज़ल-सी, लड़की
***********
कविता'किरण'
Wednesday, September 14, 2011
ज़िन्दगी इस तरह क्यों आई हो, मानो सीलन-भरी रज़ाई हो...
ज़िन्दगी इस तरह क्यों आई हो
मानो सीलन-भरी रज़ाई हो
यूँ तो मेरी ही ज़िन्दगी हो तुम
फिर भी क्यों लग रही पराई हो
जो बुरे वक़्त ने है दी मुझको
तुम वही मेरी मुंह-दिखाई हो
रंजो-गम,अश्क,आह,तन्हाई
जाने क्या साथ ले के आई हो
बोझ साँसों का सह नहीं पाए
तुम वो कमज़ोर चारपाई हो
तुम पे कैसे यक़ीं कोई कर ले
तुम कभी जून हो जुलाई हो
मुद्दतों तक कुनैन खाई है
अब तो तक़दीर में मिठाई हो
लो मुकम्मल हुई ग़ज़ल आख़िर
वाह जी वा 'किरण' बधाई हो
-कविता"किरण"
मानो सीलन-भरी रज़ाई हो
यूँ तो मेरी ही ज़िन्दगी हो तुम
फिर भी क्यों लग रही पराई हो
जो बुरे वक़्त ने है दी मुझको
तुम वही मेरी मुंह-दिखाई हो
रंजो-गम,अश्क,आह,तन्हाई
जाने क्या साथ ले के आई हो
बोझ साँसों का सह नहीं पाए
तुम वो कमज़ोर चारपाई हो
तुम पे कैसे यक़ीं कोई कर ले
तुम कभी जून हो जुलाई हो
मुद्दतों तक कुनैन खाई है
अब तो तक़दीर में मिठाई हो
लो मुकम्मल हुई ग़ज़ल आख़िर
वाह जी वा 'किरण' बधाई हो
-कविता"किरण"
Friday, September 2, 2011
बेवज़ह बस वबाल करते हो.......

बेवज़ह बस वबाल करते हो
जिंदगी को मुहाल करते हो
कब किसी का ख़याल करते हो
जान ! कितने सवाल करते हो
जी दुखाते हो पहले जी-भरकर
बाद इसके मलाल करते हो
खुद ही बर्खास्त करते हो दिल से
खुद ही वापिस बहाल करते हो
अश्क देते हो पहले आँखों में
बाद हाज़िर रूमाल करते हो
अपनी तीखी नज़र से पढ़-पढ़कर
मेरा चेहरा गुलाल करते हो
जब नज़र को नज़र समझती है
लफ्ज़ क्यों इस्तेमाल करते हो
पल में शोला हो पल में हो शबनम
तुम भी क्या-क्या कमाल करते हो
**********************
कविता" किरण "
Thursday, August 18, 2011
अधखुली आँख में सपन क्यों है....
खिल उठा देह का चमन क्यों है
सिमटा सिमटा-सा तन-सुमन क्यों है
और अदाओ में बांकपन क्यों है
मनचला हो गया है क्यों मौसम
बावरी हो गयी पवन क्यों है
सहमा सहमा हुआ-सा है दर्पण
अनमना अनमना-सा मन क्यों है
महका महका-सा है अँधेरा क्यूँ
दहका दहका हुआ-सा दिन क्यों है
कामनाएं हैं बहकी बहकी-सी
मन का चंचल हुआ हिरन क्यों है
हर सितम तुझपे जाँ छिड़कता है
तुझ में इतनी कशिश "किरण" क्यों है
************
कविता"किरण"
Thursday, July 21, 2011
स्वेद नहीं आंसू से तर हूँ मेमसाब ...
एक काम वाली बाई..जिसके बिना गृहिणियों की गृहस्थी अधूरी होती है.. उसकी अपनी भी कोई पीड़ा हो सकती है....एक अछूते विषय पर कुछ कहने की...उसकी संवेदना को व्यक्त करने की कोशिश करती हुई एक रचना प्रस्तुत है...
स्वेद नहीं आंसू से तर हूँ मेमसाब
घर के होते भी बेघर हूँ मेमसाब
मैं बाबुल के सर से उतरा बोझ हूँ
साजन के घर का खच्चर हूँ मेमसाब
घरवाले ने कब मुझको मानुस जाना
उसकी खातिर बस बिस्तर हूँ मेमसाब
आज पढ़ा कल फेंका कूड़ेदान में
फटा हुआ बासी पेपर हूँ मेमसाब
कभी कमाकर लाता न फूटी कौड़ी
कहता है धरती बंजर हूँ मेमसाब
उसकी दारु और दवा अपनी करते
बिक जाती चौराहे पर हूँ मेमसाब
आती -जाती खाती तानों के पत्थर
डरा हुआ शीशे का घर हूँ मेमसाब
अपनी और अपनों की भूख मिटाने को
खाती दर-दर की ठोकर हूँ मेमसाब
घर-घर झाड़ू-पोंछा-बर्तन करके भी
रह जाती भूखी अक्सर हूँ मेमसाब
कोई कहता धधे वाली औरत है
पी जाती खारे सागर हूँ मेमसाब
ऐसी- वैसी हूँ चाहे जैसी भी हूँ
नाकारा नर से बेहतर हूँ मेमसाब
************************
कविता'किरण'
स्वेद नहीं आंसू से तर हूँ मेमसाब
घर के होते भी बेघर हूँ मेमसाब
मैं बाबुल के सर से उतरा बोझ हूँ
साजन के घर का खच्चर हूँ मेमसाब
घरवाले ने कब मुझको मानुस जाना
उसकी खातिर बस बिस्तर हूँ मेमसाब
आज पढ़ा कल फेंका कूड़ेदान में
फटा हुआ बासी पेपर हूँ मेमसाब
कभी कमाकर लाता न फूटी कौड़ी
कहता है धरती बंजर हूँ मेमसाब
उसकी दारु और दवा अपनी करते
बिक जाती चौराहे पर हूँ मेमसाब
आती -जाती खाती तानों के पत्थर
डरा हुआ शीशे का घर हूँ मेमसाब
अपनी और अपनों की भूख मिटाने को
खाती दर-दर की ठोकर हूँ मेमसाब
घर-घर झाड़ू-पोंछा-बर्तन करके भी
रह जाती भूखी अक्सर हूँ मेमसाब
कोई कहता धधे वाली औरत है
पी जाती खारे सागर हूँ मेमसाब
ऐसी- वैसी हूँ चाहे जैसी भी हूँ
नाकारा नर से बेहतर हूँ मेमसाब
************************
कविता'किरण'
Sunday, July 3, 2011
वही रात-रात का जागना....(एक नज़्म)

वही रात-रात का जागना
वही ख़ुद को ख़ुद में तलाशना
वही बेख़ुदी, वही बेबसी
वही अपने आप से भागना!
वही जिंदगी, वही रंज़ो-ग़म
वही बेकली, वही आँख नम
वही रोज़ ही, इक दर्द से
करना पड़े हमें सामना !
वही रोना इक-इक बात पर
तकिये से मुंह को ढांपकर
सर रख के अपने हाथ पर
खाली हवाओं को ताकना !
वही आंसुओं का है सिलसिला
वही ज़ीस्त से शिकवा-गिला
वही इश्क़ सांवली रात से
वही जुगनुओं को निहारना!
कभी रो के काटी ये ज़िंदगी
कभी पा गये थोड़ी खुशी
कभी आफताब का नूर था
कभी छा गया कोहरा घना !
*******************
डॉ.कविता 'किरण'
वही ख़ुद को ख़ुद में तलाशना
वही बेख़ुदी, वही बेबसी
वही अपने आप से भागना!
वही जिंदगी, वही रंज़ो-ग़म
वही बेकली, वही आँख नम
वही रोज़ ही, इक दर्द से
करना पड़े हमें सामना !
वही रोना इक-इक बात पर
तकिये से मुंह को ढांपकर
सर रख के अपने हाथ पर
खाली हवाओं को ताकना !
वही आंसुओं का है सिलसिला
वही ज़ीस्त से शिकवा-गिला
वही इश्क़ सांवली रात से
वही जुगनुओं को निहारना!
कभी रो के काटी ये ज़िंदगी
कभी पा गये थोड़ी खुशी
कभी आफताब का नूर था
कभी छा गया कोहरा घना !
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डॉ.कविता 'किरण'
Monday, June 13, 2011
मेरी ख़ामोशी को लब,लब पर दुआ दे जायेगा.....

मेरी ख़ामोशी को लब,लब पर दुआ दे जायेगा
मुझको तन्हाई में हंसने की अदा दे जायेगा
ले गया मुझको चुराकर मुझसे जो पूछे बगैर
देख लेना एक दिन अपना पता दे जायेगा
छेड़कर चुपके-से इक दिन मेरी साँसों का सितार
वो दबी चिंगारियों को फिर हवा दे जायेगा
बंदिशें सब तोड़कर झूठी रिवाजों-रस्म की
मेरे क़दमों को नया इक रास्ता दे जायेगा
देगा इक ताज़ा तरन्नुम जिंदगी की नज़्म को
मेरी गज़लों को नया इक काफिया दे जायेगा
भूल ना जाऊं कहीं भूले-से उसको इसलिए
मुझको अपनी चाहतों का वास्ता दे जायेगा
ए"किरण क्यों ना करे दिल उस सनम का इंतज़ार
जो तबस्सुम लब को, दिल को हौसला दे जायेगा
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डॉ.कविता'किरण'
मुझको तन्हाई में हंसने की अदा दे जायेगा
ले गया मुझको चुराकर मुझसे जो पूछे बगैर
देख लेना एक दिन अपना पता दे जायेगा
छेड़कर चुपके-से इक दिन मेरी साँसों का सितार
वो दबी चिंगारियों को फिर हवा दे जायेगा
बंदिशें सब तोड़कर झूठी रिवाजों-रस्म की
मेरे क़दमों को नया इक रास्ता दे जायेगा
देगा इक ताज़ा तरन्नुम जिंदगी की नज़्म को
मेरी गज़लों को नया इक काफिया दे जायेगा
भूल ना जाऊं कहीं भूले-से उसको इसलिए
मुझको अपनी चाहतों का वास्ता दे जायेगा
ए"किरण क्यों ना करे दिल उस सनम का इंतज़ार
जो तबस्सुम लब को, दिल को हौसला दे जायेगा
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डॉ.कविता'किरण'
Sunday, May 29, 2011
अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ............

अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ
बरसातों में ठूंठ कहीं है हरा हुआ
करके गंगा-स्नान धो लिए सारे पाप
सोच रहे फिर सौदा कितना खरा हुआ
सीमा से ज्यादा जब बढ़ जाती है प्यास
खाली हो जाता है सागर भरा हुआ
फूलों के तन से ज्यादा मन घायल है
पत्थर को अहसास नहीं ये ज़रा हुआ
भूत-प्रेत और देता दोष हवाओं को
अपने अंतर्मन से आदम डरा हुआ
जब ऊपरवाला अपनी पर आएगा
रह जायेगा खेल 'धरा' का धरा हुआ
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डॉ कविता'किरण'
बरसातों में ठूंठ कहीं है हरा हुआ
करके गंगा-स्नान धो लिए सारे पाप
सोच रहे फिर सौदा कितना खरा हुआ
सीमा से ज्यादा जब बढ़ जाती है प्यास
खाली हो जाता है सागर भरा हुआ
फूलों के तन से ज्यादा मन घायल है
पत्थर को अहसास नहीं ये ज़रा हुआ
भूत-प्रेत और देता दोष हवाओं को
अपने अंतर्मन से आदम डरा हुआ
जब ऊपरवाला अपनी पर आएगा
रह जायेगा खेल 'धरा' का धरा हुआ
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डॉ कविता'किरण'
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