दिनांक 7,8 व 9 सितंबर 2010 को काठमांडू में त्रिदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन नेपाल,काठमांडू स्थित भारतीय राजदूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया. इस संगोष्ठी का शुभारंभ हास्य कवि सम्मेलन से होना था.इस हास्य कवि सम्मेलन में सम्मलित होने वाले कवियों में हास्य कवि सम्राट सर्वश्री सुरेंद्र शर्मा, महेंद्र शर्मा, अरुण जैमिनी, दीपक गुप्ता,कविता"किरण",विवेक गौतम और नेपाली कवि सर्वश्री लक्ष्मण गाम्नागे और शैलेंद्र सिंखडा थे.इस हास्य कवि सत्र का उद्घाटन नेपाली राष्ट्रपति महामहिम डॉ. श्री रामवरण यादव द्वारा दीप प्रज्ज्व्लित करके किया गया. इस उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रग्या प्रतिष्ठान के श्री बैरागी काइंला द्वारा की गई.स्वागत उपकुलपति श्री गंगा प्रसाद उप्रेती द्वारा किया गया. इस अवसर पर आमंत्रित विशिष्ट अतिथियों में नेपाली शिक्षा मंत्री, संस्कृति मंत्री और भारतीय राजदूत श्री राकेश सूद थे जिन्होंने आशीर्वचन और अपने-अपने उद्बोधन भाषण दिए.नेपाली राष्ट्रपति ने न केवल इस मैत्रीपूर्ण हास्य कवि सम्मेलन के लिए भारतीय राजदूतावास काठमांडू और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली को बधाई दी बल्कि उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ हास्य का लुत्फ भी लिया.
नाम मेरा 'किरण' है ऐ साहिब!मेरे अंदर मेरा उजाला है-डॉ.कविता"किरण" I AM LIGHT OF LOVE,LET ME SPREAD IN YOUR HEART AND YOUR LIFE-Dr.kavita'kiran'
Wednesday, September 15, 2010
कविताकिरण -नेपाल -यात्रा (एक रिपोर्ट)
दिनांक 7,8 व 9 सितंबर 2010 को काठमांडू में त्रिदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन नेपाल,काठमांडू स्थित भारतीय राजदूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया. इस संगोष्ठी का शुभारंभ हास्य कवि सम्मेलन से होना था.इस हास्य कवि सम्मेलन में सम्मलित होने वाले कवियों में हास्य कवि सम्राट सर्वश्री सुरेंद्र शर्मा, महेंद्र शर्मा, अरुण जैमिनी, दीपक गुप्ता,कविता"किरण",विवेक गौतम और नेपाली कवि सर्वश्री लक्ष्मण गाम्नागे और शैलेंद्र सिंखडा थे.इस हास्य कवि सत्र का उद्घाटन नेपाली राष्ट्रपति महामहिम डॉ. श्री रामवरण यादव द्वारा दीप प्रज्ज्व्लित करके किया गया. इस उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रग्या प्रतिष्ठान के श्री बैरागी काइंला द्वारा की गई.स्वागत उपकुलपति श्री गंगा प्रसाद उप्रेती द्वारा किया गया. इस अवसर पर आमंत्रित विशिष्ट अतिथियों में नेपाली शिक्षा मंत्री, संस्कृति मंत्री और भारतीय राजदूत श्री राकेश सूद थे जिन्होंने आशीर्वचन और अपने-अपने उद्बोधन भाषण दिए.नेपाली राष्ट्रपति ने न केवल इस मैत्रीपूर्ण हास्य कवि सम्मेलन के लिए भारतीय राजदूतावास काठमांडू और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली को बधाई दी बल्कि उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ हास्य का लुत्फ भी लिया.
Saturday, September 4, 2010
(५ से १० सित।तक नेपाल-यात्रा पर रहूंगी. सभी मित्रों की शुभकामनाये और आशीर्वाद अपेक्षित है...)
दिनांक 6,7,8 सितम्बर2010 को नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित होनेवाले तीनदिवसीय हिंदी समारोह में भाग लेने हेतु "भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्"( ICCR)
दिल्ली, की ओर से भेजे जानेवाले प्रतिनिधि मंडल में फालना,राजस्थान की
कवयत्री डॉ कविता"किरण" को भी शामिल किया गया है। (५ से १० सित।तक
नेपाल-यात्रा पर रहूंगी. सभी मित्रों की शुभकामनाये और आशीर्वाद अपेक्षित है...)
Wednesday, September 1, 2010
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये
-कविता किरण
Sunday, August 22, 2010
रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर ***********
नहीं चाहिए मुझको हिस्सा माँ-बाबा की दौलत में
चाहे वो कुछ भी लिख जाएँ भैया मेरे ! वसीयत में
नहीं चाहिए मुझको झुमका चूड़ी पायल और कंगन
नहीं चाहिए अपनेपन की कीमत पर बेगानापन
मुझको नश्वेर चीज़ों की दिल से कोई दरकार नहीं
संबंधों की कीमत पर कोई सुविधा स्वीकार नहीं
माँ के सारे गहने-कपड़े तुम भाभी को दे देना
बाबूजी का जो कुछ है सब ख़ुशी ख़ुशी तुम ले लेना
चाहे पूरे वर्ष कोई भी चिट्ठी-पत्री मत लिखना
मेरे स्नेह-निमंत्रण का भी चाहे मोल नहीं करना
नहीं भेजना तोहफे मुझको चाहे तीज-त्योहारों पर
पर थोडा-सा हक दे देना बाबुल के गलियारों पर
रूपया पैसा कुछ ना चाहूँ..बोले मेरी राखी है
आशीर्वाद मिले मैके से मुझको इतना काफी है
तोड़े से भी ना टूटे जो ये ऐसा मन -बंधन है
इस बंधन को सारी दुनिया कहती रक्षाबंधन है
तुम भी इस कच्चे धागे का मान ज़रा-सा रख लेना
कम से कम राखी के दिन बहना का रस्ता तक लेना
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कविता"किरण"
***रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं***
Wednesday, August 11, 2010
माया के परदे में क्या मन दिखता है कहीं धूप में तारों का तन दिखता है

कहीं धूप में तारों का तन दिखता है
जब भी मन करता है जी भरकर बरसे
बरसातों को मेरा आँगन दिखता है
गये सैर को अपने अंतरमन की ओर
साँपों से लिपटा चन्दनवन दिखता है
अर्जुन को दिखती है बस चिड़िया की आँख
और प्यासे चातक को सावन दिखता है
किया सामना जब-जब भी आईने का
अन्जाना बेगाना दर्पण दिखता है
हाथ जुड़े मजदूरों के मज़बूरी में
पर दिखने को सबको वंदन दिखता है
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(तुम्ही कुछ कहो ना! में से.....)
डॉ कविता'किरण'
Friday, July 30, 2010
छुपके सिरहाने में रोते हैं , लोग दीवाने क्यों होते हैं

लोग दीवाने क्यों होते हैं
हर गहरी साजिश के पीछे
दोस्त पुराने क्यों होते हैं
बन गये दिल पर बोझ जो ऐसे
साथ निभाने क्यों होते हैं
हर युग में दिल के शीशे को
पत्थर खाने क्यों होते हैं
जब भी वक़्त बुरा आता है
अश्क बहाने क्यों होते हैं
जो रंजो-गम नाप न पायें
वो पैमाने क्यों होते हैं
अश्कों से तर आँख हो फिर भी
लब मुस्काने क्यों होते हैं
'किरण' तेरी तिरछी नज़रों के
हम ही निशाने क्यों होते हैं
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डॉ कविता'किरण'
Tuesday, July 20, 2010
Sunday, July 4, 2010
चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा
मिटटी का दामन कितना तरसा होगा
सागर भरकर भी ना प्यासी रह जाऊं
गागर के भीतर कोई डर-सा होगा
बादल सोच रहा है अबके बारिश में
जाने कितनी बूंदों का खर्चा होगा
कब आएगा दिन जब मीठी झीलों में
रेगिस्तानों का कोई चर्चा होगा
किसने सोचा था ये जीने से पहले
इतना मुश्किल जीवन का परचा होगा
मेरे घर को आग लगाने वाले सुन
तेरा घर भी तो मेरे घर-सा होगा
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डॉ कविता"किरण"
Wednesday, June 9, 2010
बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना!..
है हरसू उदासी तुम्ही कुछ कहो ना!
मैं पतझड़ का मौसम हूँ चुप ही रहा हूँ
ओ गुलशन के वासी! तुम्ही कुछ कहो ना!
कि ढलने को आई शबे-गम ये आधी
है बाकी ज़रा-सी तुम्ही कुछ कहो ना!
समाकर समंदर में भी रह गयी है
लहर एक प्यासी तुम्ही कुछ कहो ना!
मेरे दिल में तुम हो कहीं ये ज़माना
न ले ले तलाशी तुम्ही कुछ कहो ना!
'किरण' बुझ न जाना,गमो कि फिजां में
चली है हवा-सी तुम्ही कुछ कहो ना!
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डॉ कविता"किरण"
Tuesday, June 1, 2010
अजनबी अपना ही साया हो गया है --वर्तमान पीढ़ी पर कुछ शेर...
खून अपना ही पराया हो गया है
मांगता है फूल डाली से हिसाब
मुझपे क्या तेरा बकाया हो गया है
बीज बरगद में हुआ तब्दील तो
सेर भी बढ़कर सवाया हो गया है
बूँद ने सागर को शर्मिंदा किया
फिर धरा का सृजन जाया हो गया है
बात घर की घर में थी अब तक 'किरण'
राज़ अब जग पर नुमायाँ हो गया है
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डॉ कविता"किरण"
Monday, May 24, 2010
watch me on DD1 (national channal)at 7.15 pm to 8pm on 26 may (wednesday)in programme "Chalo chakradhar chaman mein" n the topic is "Vradhhashram"
in programme "Chalo chakradhar chaman mein" n the topic is "Vradhhashram"
जिसका पुनः प्रसारण डी डी भारती पर शुक्रवार शाम ७.३० और रविवार रात १०.३० पर देखें और कृपया अपनी राय भी दें। धन्यवाद.
Monday, May 17, 2010
ख्वाब आते रहे ख्वाब जाते रहे नींद ही में अधर मुस्कुराते रहे

नींद ही में अधर मुस्कुराते रहे
सुरमई साँझ इकरार की थी मगर
रस्म इनकार की हम निभाते रहे
चांदनी रात में कांपती लहरों को
कंकरों से निशाना बनाते रहे
बोझ शर्मो-हया का ही हम रात-भर
रेशमी नम पलक पर उठाते रहे
उनके बेबाक इजहारे-उल्फत पे बस
दांत में उँगलियाँ ही दबाते रहे
वक़्त की बर्फ यूँ ही पिघलती रही
वो मनाते रहे हम लजाते रहे
ऐ "किरण" रात ढलती रही हम फ़क़त
रेत पर नाम लिखते मिटाते रहे
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डॉ कविता"किरण"
Saturday, May 1, 2010
आज मजदूर दिवस है. और इस अवसर पर मैं मजदूर की पीड़ा का रेखांकन करती हुई, उनकी संवेदनाओं से जुडी हुई एक ग़ज़ल बयान करना चाहती हूँ. कृपया इसे नवाजें..
अबके तनख्वा दे दो सारी बाबूजी
अब के रख लो लाज हमारी बाबूजी
इक तो मार गरीबी की लाचारी है
भूखे बच्चों का मुरझाया चेहरा देख
दिल पर चलती रोज़ कटारी बाबूजी
नून-मिरच मिल जाएँ तो बडभाग हैं
हमने देखी ना तरकारी बाबूजी
दूधमुंहे बच्चे को रोता छोड़ हुई
घरवाली भगवान को प्यारी बाबूजी
आधा पेट काट ले जाता है बनिया
खाके आधा पेट गुजारी बाबूजी
पीढ़ी-पीढ़ी खप गयी ब्याज चुकाने में
फिर भी कायम रही उधारी बाबूजी
दिन-भर मेनत करके खांसें रात-भर
बीत रहा है पल-पल भारी बाबूजी
ना जीने की ताकत ना आती है मौत
जिंदगानी तलवार दुधारी बाबूजी
मजबूरी में हक भी डर के मांगे हैं
बने शौक से कौन भिखारी बाबूजी
पूरे पैसे दे दो पूरा खा लें आज
बच्चे मांग रहे त्यौहारी बाबूजी
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डॉ कविता'किरण'
Thursday, April 15, 2010
जिसकी आँखों में सिर्फ पानी है ..Jiski aankho me sirf pani hai...
कर दी आसान मुश्किलें सारी
मौत भी किस क़दर सुहानी है
आज तो बोल दे 'किरण' सब कुछ
ख़त्म पर फिर तो जिंदगानी है
( 'दर्द का सफ़र' में से )
Wednesday, March 31, 2010
ज़ुल्फ़ जब खुल के बिखरती है मेरे शाने पर zulf jab khulke bikharti hai mere shane per...
Monday, March 22, 2010
शहीद दिवस पर सभी अमर शहीदों को शत शत नमन!
है अब तो हर तरफ इक आग का आलम कहाँ जाएँ
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ज़हन में क्यों भरा बारूद क्यों हाथों में खंज़र हैं
यहाँ चारों तरफ क्योंकर बिछे लाशों के मंज़र हैं
करें हर घर को फुलवारी हर इक कूचा चमन कर लें
Monday, March 15, 2010
मेरी आँखों में अगर झांकोगे जल जाओगे
इश्क की राहगुज़र पे न संभल पाओगे
ye sher mere pasandeeda gazal gayak gulam ali sahab ke liye
Saturday, February 13, 2010
डूबना तेरे ख्यालों में भला लगता ..( दिवस पर प्रेम एक की ग़ज़ल.......)

तेरी यादों से बिछड़ना भी सजा लगता है
जो भी मिलता है सनम तुझ पे फ़िदा लगता है
तेरी सूरत में है पोशीदा खुदा लगता है
दिल में, धड़कन में, निगाहों में छुपा लगता है
मुझमें रहता है मगर कौन मेर लगता है
क्यों क़दम मेरे तेरी और खिंचे आते हैं
तेरे घर का कोई दरवाज़ा खुला लगता है
जब तेरा ख्वाब हो आबाद मेरी पलकों में
दिल भी धडके तो निगाहों को बुरा लगता है
लड़खड़ा जाएँ क़दम साँस भी हो बेकाबू
जब शहर में तेरे आने का पता लगता है
ऐ 'किरण' खूब जहाँ में हैं ग़ज़ल गो लेकिन
तेरा अंदाज़ ज़माने से जुदा लगता है
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डॉ कविता 'किरण'
Wednesday, February 3, 2010
बात छोटी है मगर सादा नहीं....

प्यार में हो कोई समझौता नहींतुम पे हक हो या फलक पे चाँद होचाहिए पूरा मुझे आधा नहींदिल के बदले दांव पर दिल ही लगे
इससे कुछ भी कम नहीं ज्यादा नहींमर मिटे हैं जो मेरी मुस्कान पर
उनको मेरे ग़म का अंदाज़ा नहीं इक न इक दिन टूट जाना है 'किरण'
इसलिए करना कोई वादा नहीं
**********************डॉ कविता'किरण'













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