डॉ.कविता'किरण'( कवयित्री) Dr.kavita'kiran' (poetess)

नाम मेरा 'किरण' है ऐ साहिब!मेरे अंदर मेरा उजाला है-डॉ.कविता"किरण" I AM LIGHT OF LOVE,LET ME SPREAD IN YOUR HEART AND YOUR LIFE-Dr.kavita'kiran'

Wednesday, October 28, 2009

(मेरा सृजन संसार)

›
गम बाँटने को अपना लिक्खी है कुछ किताबें जिनको पढेग...
9 comments:
Monday, October 26, 2009

अपने बारे में

›
**** इस ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर...
5 comments:

रिश्ते!

›
रिश्ते! गीली लकड़ी की तरह सुलगते रहते हैं सारी उम्र। कड़वा कसैला धुँआ उगलते रहते हैं। पर कभी भी जलकर भस्म नही होते। ख़त्म नही होते। सताते है...
7 comments:
Wednesday, October 21, 2009

व्यर्थ नहीं हूँ मैं!

›
व्यर्थ नहीं हूँ मैं! जो तुम सिद्ध करने में लगे हो बल्कि मेरे कारण ही हो तुम अर्थवान अन्यथा अनर्थ का पर्यायवाची होकर रह जाते तुम। मैं स्त्री ...
16 comments:
Wednesday, October 14, 2009

दिल पे कोई नशा न तारी हो

›
दिल पे कोई नशा न तारी हो रूह तक होश में हमारी हो कुछ फकीरों के संग यारी हो जेब में कायनात सारी हो हैं सभी हुस्न की ...
8 comments:
Tuesday, October 13, 2009

›
चाँद धरती पे उतरता कब है आईना रोज़ संवरता कब है अक्स पानी पे ठहरता कब है हमसे कायम ये भरम है वरना चाँद धरती पे उतरता कब है न ...
2 comments:

ये सोच के हम भीगे

›
गर सारे परिंदों को पिंजरों में बसा लोगे सहरा में समंदर का फ़िर किससे पता लोगे ये सोच के हम भीगे पहरों तक...
3 comments:
Thursday, October 8, 2009

लो समंदर को सफीना कर लिया

›
लो समंदर को सफीना कर लिया हमने यूँ आसान जीना कर लिया अब नहीं है दूर मंजिल सोचकर साफ़ माथे का पसीना कर लिया जीस्त के तपत...
4 comments:
Wednesday, October 7, 2009

रेत पर घर बना लिया मैंने

›
दिल में अरमां जगा लिया मैंने दिन खुशी से बिता लिया मैंने इक समंदर को मुंह चिढाना था रेत पर घर बना लिया मैंने अपने दिल को सुकून देने को इक...
2 comments:

नामुमकिन को मुमकिन करने निकले हैं

›
नामुमकिन को मुमकिन करने निकले हैं हम छलनी में पानी भरने निकले हैं आंसू पोंछ न पाए अपनी आंखों के और जगत की पीड़ा हरने निकले हैं पानी बरस रहा ...
3 comments:
Monday, October 5, 2009

दोस्ती किस तरह निभाते हैं

›
दोस्ती किस तरह निभाते हैं मेरे दुश्मन मुझे सिखाते हैं नापना चाहते हैं दरिया को वो जो बरसात में न हाते हैं ख़ुद से नज़रें मिल...
11 comments:
Wednesday, August 26, 2009

जिंदगी को इक नया-सा मोड़ दे

›
जिंदगी को इक नया-सा मोड़ दे अपनी कश्ती को भंवर में छोड़ दे हौसले की इक नई तहरीर लिख खौफ की सारी हदों को तोड़ दे फ़िर किसी इज़हार को स्वीकार...
11 comments:
‹
Home
View web version

ABOUT ME

My photo
Dr. kavita 'kiran' (poetess)
Falna, Rajasthan, India
कलम अपनी,जुबां अपनी, कहन अपनी ही रखती हूँ, अंधेरों से नहीं डरती "किरण" हूँ खुद चमकती हूँ, ज़माना कागजी फूलों पे अपनी जां छिड़कता है मगर मैं हूँ की बस अपनी ही खुशबू से महकती हूँ-- **** इस ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मकसद फ़क़त एक कोशिश है ख़ुद को ख़ुद से बाहर लाने की। बहुत कुछ अनकहा कह देने की। अपने खास लम्हों की कहन को आम कर देने की। इस ब्लॉग के जरिये मैं ख़ुद को समेटकर अपनी अनुभूतियों के विस्तृत आकाश को दुनिया के सामने फैला रही हूँ और दावत देती हूँ सभी काव्यप्रेमियों को अपने इस सृजन के आकाश में उडान भरने के लिए। दरअसल जिंदगी के कैनवास पर वक्त की तूलिका ने जब, जिन रंगों से, जो चित्र उकेरे, यह ब्लॉग उसी की एक चित्रावली है. एक शब्दावली, जो आपके कानों तक पहुंचना चाहती है। एक द्रश्यावली जो आपकी नज़र को छू के गुजरना चाहती है, आपके सामने है। सफर में हूँ । मंजिल तक पहुंचना चाहती हूँ। कब पहुँचती हूँ ! देखते हैं*******
View my complete profile
Powered by Blogger.