डॉ.कविता'किरण'( कवयित्री) Dr.kavita'kiran' (poetess)

नाम मेरा 'किरण' है ऐ साहिब!मेरे अंदर मेरा उजाला है-डॉ.कविता"किरण" I AM LIGHT OF LOVE,LET ME SPREAD IN YOUR HEART AND YOUR LIFE-Dr.kavita'kiran'

Friday, July 30, 2010

छुपके सिरहाने में रोते हैं , लोग दीवाने क्यों होते हैं

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छुपके सिरहाने में रोते हैं लोग दीवाने क्यों होते हैं हर गहरी साजिश के पीछे दोस्त पुराने क्यों होते हैं बन गये दिल पर बोझ...
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Tuesday, July 20, 2010

'दर्द'! तुझको पनाह देने को ......

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'दर्द'! तुझको पनाह देने को एक दिल था उसे भी दे डाला ************** डॉ कविता ' किरण '
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Sunday, July 4, 2010

चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा

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चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा मिटटी का दामन कितना तरसा होगा सागर भरकर भी ना प्यासी रह जाऊं गागर के भीतर कोई डर - सा होग...
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Wednesday, June 9, 2010

बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना!..

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बहुत है ख़ामोशी तुम्ही कुछ कहो ना! है हरसू उदासी तुम्ही कुछ कहो ना! मैं पतझड़ का मौसम हूँ चुप ही रहा हूँ ओ गुलशन के वासी! तुम्ही कुछ कहो ना! ...
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Tuesday, June 1, 2010

अजनबी अपना ही साया हो गया है --वर्तमान पीढ़ी पर कुछ शेर...

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अजनबी अपना ही साया हो गया है खून अपना ही पराया हो गया है मांगता है फूल डाली से हिसाब मुझपे क्या तेरा बकाया हो गया है ...
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Monday, May 24, 2010

watch me on DD1 (national channal)at 7.15 pm to 8pm on 26 may (wednesday)in programme "Chalo chakradhar chaman mein" n the topic is "Vradhhashram"

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watch me on DD1 (national channal) at 7।15 pm to 8pm on 26 may (wednesday) in programme "Chalo chakradhar chaman mein" n the topic...
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Monday, May 17, 2010

ख्वाब आते रहे ख्वाब जाते रहे नींद ही में अधर मुस्कुराते रहे

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ख्वाब आते रहे ख्वाब जाते रहे नींद ही में अधर मुस्कुराते रहे सुरमई साँझ इकरार की थी मगर रस्म इनकार की हम निभाते रहे चांदनी रात में कांपती ल...
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Saturday, May 1, 2010

आज मजदूर दिवस है. और इस अवसर पर मैं मजदूर की पीड़ा का रेखांकन करती हुई, उनकी संवेदनाओं से जुडी हुई एक ग़ज़ल बयान करना चाहती हूँ. कृपया इसे नवाजें..

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अबके तनख्वा दे दो सारी बाबूजी अब के रख लो लाज हमारी बाबूजी इक तो मार गरीबी की लाचारी है उस पर टी . बी . की ...
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Thursday, April 15, 2010

जिसकी आँखों में सिर्फ पानी है ..Jiski aankho me sirf pani hai...

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जिसकी आँखों में सिर्फ पानी है वो ग़ज़ल आपको सुनानी है  अश्क कैसे गिरा दूँ पलकों  से  मेरे महबूब की निशानी  है   लब पे वो बात ...
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Wednesday, March 31, 2010

ज़ुल्फ़ जब खुल के बिखरती है मेरे शाने पर zulf jab khulke bikharti hai mere shane per...

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ज़ुल्फ़ जब खुल के बिखरती  है मेरे शाने पर बिजलियाँ टूट के गिरती हैं इस ज़माने पर हुस्न ने खाई क़सम है नहीं पिघलने की इश्क आमादा है इस बर्फ को ग...
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Monday, March 22, 2010

शहीद दिवस पर सभी अमर शहीदों को शत शत नमन!

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है अब तो हर तरफ इक आग का आलम कहाँ जाएँ  बना  है  आदमी मानव से मानव बम कहाँ जाएँ  कहीं बारूद की बस्ती कहीं दहशत क़ि दुनिया है   'किरण...
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Monday, March 15, 2010

मेरी आँखों में अगर झांकोगे जल जाओगे

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 ज़ख्म ऐसा जिसे खाने को मचल जाओगे इश्क की राहगुज़र पे न संभल पाओगे             मैं अँधेरा सही सूरज को है देखा बरसों म...
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Saturday, February 13, 2010

डूबना तेरे ख्यालों में भला लगता ..( दिवस पर प्रेम एक की ग़ज़ल.......)

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डूबना तेरे ख्यालों में भला लगता है तेरी यादों से बिछड़ना भी सजा लगता है जो भी मिलता है सनम तुझ पे फ़िदा लगता है तेरी सूरत में है...
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Wednesday, February 3, 2010

बात छोटी है मगर सादा नहीं....

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बात छोटी है मगर सादा नहीं प्यार में हो कोई समझौता नहीं तुम पे हक हो या फलक पे चाँद हो चाहिए पूरा मुझे आधा नहीं दिल ...
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Friday, January 22, 2010

एक ग़ज़ल श्रंगार की

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मुझमें जादू कोई जगा तो है मेरी बातों में इक अदा तो है नज़रें मिलते ही लडखडाया वो मेरी आँखों में इक नशा तो है आईने रास ...
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Monday, January 11, 2010

'काव्य रत्न' सम्मान ग्रहण करते हुए कवियत्री डॉ कविता'किरण'

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२५ दिसंबर ०९ को पानीपत में ' काव्य रत्न ' सम्मान ग्रहण करते हुए कवियत्री डॉ कविता ' किरण ' कलम अपनी , जुबां ...
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Wednesday, December 30, 2009

ज़ख्म छुपाकर तू अपना,नए साल का गीत सुना...

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नए साल की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ एक गीत पेशे - खिदमत है . ..- ज़ख्म छुपाकर तू अपना नए साल का गीत सुना आज के दिन रोना हैं ...
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Dr. kavita 'kiran' (poetess)
Falna, Rajasthan, India
कलम अपनी,जुबां अपनी, कहन अपनी ही रखती हूँ, अंधेरों से नहीं डरती "किरण" हूँ खुद चमकती हूँ, ज़माना कागजी फूलों पे अपनी जां छिड़कता है मगर मैं हूँ की बस अपनी ही खुशबू से महकती हूँ-- **** इस ब्लॉग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने का मकसद फ़क़त एक कोशिश है ख़ुद को ख़ुद से बाहर लाने की। बहुत कुछ अनकहा कह देने की। अपने खास लम्हों की कहन को आम कर देने की। इस ब्लॉग के जरिये मैं ख़ुद को समेटकर अपनी अनुभूतियों के विस्तृत आकाश को दुनिया के सामने फैला रही हूँ और दावत देती हूँ सभी काव्यप्रेमियों को अपने इस सृजन के आकाश में उडान भरने के लिए। दरअसल जिंदगी के कैनवास पर वक्त की तूलिका ने जब, जिन रंगों से, जो चित्र उकेरे, यह ब्लॉग उसी की एक चित्रावली है. एक शब्दावली, जो आपके कानों तक पहुंचना चाहती है। एक द्रश्यावली जो आपकी नज़र को छू के गुजरना चाहती है, आपके सामने है। सफर में हूँ । मंजिल तक पहुंचना चाहती हूँ। कब पहुँचती हूँ ! देखते हैं*******
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