Thursday, April 15, 2010

जिसकी आँखों में सिर्फ पानी है ..Jiski aankho me sirf pani hai...


जिसकी आँखों में सिर्फ पानी है
वो ग़ज़ल आपको सुनानी है 

अश्क कैसे गिरा दूँ पलकों  से 
मेरे महबूब की निशानी  है
 
लब पे वो बात ला नहीं पाए   
जो कि हर हाल  में बतानी  है

 कहीं आंसू कहीं तबस्सुम  है
कुछ हकीकत है कुछ कहानी  है

हमने लिखा नहीं  किताबों में
अपना जो भी है मुंह ज़बानी है 

कर दी आसान मुश्किलें सारी 
मौत भी किस क़दर सुहानी है 

आज तो बोल दे 'किरण' सब कुछ   
ख़त्म पर फिर तो जिंदगानी है
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( 'दर्द का सफ़र' में से )
डॉ कविता'किरण'

Wednesday, March 31, 2010

ज़ुल्फ़ जब खुल के बिखरती है मेरे शाने पर zulf jab khulke bikharti hai mere shane per...

ज़ुल्फ़ जब खुल के बिखरती  है मेरे शाने पर
बिजलियाँ टूट के गिरती हैं इस ज़माने पर

हुस्न ने खाई क़सम है नहीं पिघलने की
इश्क आमादा है इस बर्फ को गलाने पर

ताक में बैठे हैं इन्सान और फ़रिश्ते भी 
सबकी नज़रें हैं टिकी रूप के खजाने पर

देखकर मुझको वो आदम से बन गया शायर 
जाने क्या-क्या नहीं गुजरी मेरे दीवाने पर

मुन्तजिर हैं ये नज़ारे नज़र मिला लूँ पर
शर्म का बोझ है पलकों के शामियाने पर

लोग समझे कि'किरण'तू है कोई मयखाना 
कोई जाता ही नहीं अब शराबखाने पर
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डॉ.कविता'किरण' 
('तुम्ही कुछ कहो ना!' में से)

Monday, March 22, 2010

शहीद दिवस पर सभी अमर शहीदों को शत शत नमन!


है अब तो हर तरफ इक आग का आलम कहाँ जाएँ 
बना  है  आदमी मानव से मानव बम कहाँ जाएँ 
कहीं बारूद की बस्ती कहीं दहशत क़ि दुनिया है  
'किरण' इंसानियत का घुट रहा है दम कहाँ जाएँ 
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ज़हन में क्यों  भरा बारूद क्यों हाथों में खंज़र हैं 
 यहाँ चारों तरफ क्योंकर बिछे लाशों के मंज़र हैं 
क्यों मिटटी के लिए लड़ते हैं  मिटटी से बने पुतले
क्यों नफरत की सुलगती तीलियाँ सीनों के अंदर  हैं  
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करें हर घर को फुलवारी हर इक कूचा चमन कर लें
बहारों से सजा गुलशन चलो  अपना वतन कर लें
लहू देकर जिन्होंने अपना आज़ादी की कीमत दी
'किरण' हम आज उन सारे शहीदों को नमन कर लें
************डॉ कविता'किरण'



Monday, March 15, 2010

मेरी आँखों में अगर झांकोगे जल जाओगे



 ज़ख्म ऐसा जिसे खाने को मचल जाओगे
इश्क की राहगुज़र पे न संभल पाओगे 
          
मैं अँधेरा सही सूरज को है देखा बरसों
मेरी आँखों में अगर झांकोगे जल जाओगे


ye sher mere pasandeeda gazal gayak gulam ali sahab ke liye
मैंने माना कि हो पहुंचे हुए फनकार मगर
एक दिन मेरी  किताबों से ग़ज़ल गाओगे

इतना कमसिन है मेरे नगमों का ये ताजमहल
तुम भी देखोगे तो दोस्त! मचल जाओगे

'किरण' चाँद से कह दो कि इतरो इतना 
रात-भर चमकोगे कल सुबह तो ढल जाओगे
          ************* डॉ कविता'किरण


Saturday, February 13, 2010

डूबना तेरे ख्यालों में भला लगता ..( दिवस पर प्रेम एक की ग़ज़ल.......)


डूबना तेरे ख्यालों में भला लगता है
तेरी यादों से बिछड़ना भी सजा लगता है

जो भी मिलता है सनम तुझ पे फ़िदा लगता है
तेरी सूरत में है पोशीदा खुदा लगता है

दिल में, धड़कन में, निगाहों में छुपा लगता है
मुझमें रहता है मगर कौन मेर लगता है

क्यों क़दम मेरे तेरी और खिंचे आते हैं
तेरे घर का कोई दरवाज़ा खुला लगता है

जब तेरा ख्वाब हो आबाद मेरी पलकों में
दिल भी धडके तो निगाहों को बुरा लगता है

लड़खड़ा जाएँ क़दम साँस भी हो बेकाबू
जब शहर में तेरे आने का पता लगता है

'किरण' खूब जहाँ में हैं ग़ज़ल गो लेकिन
तेरा अंदाज़ ज़माने से जुदा लगता है
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डॉ कविता 'किरण'



Wednesday, February 3, 2010

बात छोटी है मगर सादा नहीं....


बात छोटी है मगर सादा नहीं
प्यार में हो कोई समझौता
नहींतुम पे हक हो या फलक पे चाँद होचाहिए पूरा मुझे आधा नहींदिल के बदले दांव पर दिल ही लगे
इससे कुछ भी कम नहीं ज्यादा नहींमर मिटे हैं जो मेरी मुस्कान पर
उनको मेरे ग़म का अंदाज़ा नहीं इक न इक दिन टूट जाना है 'किरण'
इसलिए करना कोई वादा नहीं
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डॉ कविता'किरण'

Friday, January 22, 2010

एक ग़ज़ल श्रंगार की

मुझमें जादू कोई जगा तो है
मेरी बातों में इक अदा तो है

नज़रें मिलते ही लडखडाया वो
मेरी आँखों में इक नशा तो है

आईने रास गये मुझको
कोई मुझ पे भी मर मिटा तो है

धूप की आंच कम हुई तो क्या
सर्दियों का बदन तपा तो है

नाम उसने मेरा शमां रक्खा
इस पिघलने में इक मज़ा तो है

देखकर मुझको कह रहा है वो
दर्दे-दिल की कोई दवा तो है

उसकी हर राह है मेरे घर तक
पास उसके मेरा पता तो है

वो 'किरण' मुझको मुझसे मांगे है
मेरे लब पे भी इक दुआ तो है
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डॉ कविता'किरण'



Monday, January 11, 2010

'काव्य रत्न' सम्मान ग्रहण करते हुए कवियत्री डॉ कविता'किरण'


२५ दिसंबर ०९ को पानीपत में 'काव्य रत्न' सम्मान ग्रहण करते हुए कवियत्री डॉ कविता'किरण'

कलम अपनी,जुबां अपनी, कहन अपनी ही रखती हूँ,
अंधेरों से नहीं डरती 'किरण' हूँ खुद चमकती हूँ,
ज़माना कागजी फूलों पे अपनी जां छिड़कता है
मगर मैं हूँ की बस अपनी ही खुशबू से महकती हूँ
***डॉ.कविता'किरण

Wednesday, December 30, 2009

ज़ख्म छुपाकर तू अपना,नए साल का गीत सुना...

नए साल की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ एक गीत पेशे -खिदमत है...-

ज़ख्म छुपाकर तू अपना
नए साल का गीत सुना
आज के दिन रोना हैं मना
नए साल का गीत सुना

आँख है तेरी नम तो क्या
चैन बहुत है कम तो क्या
बुन खुशहाली का सपना
नए साल का गीत सुना

है घनघोर अँधेरा पर
तू सूरज की बातें कर
दिल कर दे दरिया जितना
नए साल का गीत सुना

जानेवाले पल का क्या
आनेवाले कल का क्या
आज अभी की ख़ैर मना
नए साल का गीत सुना

पूछ 'किरण' मत अपना हाल
 एक सरीखा है  हर साल
दर्द बढ़ा है दिन दुगना
नए साल का गीत सुना
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डॉ कविता'किरण'



Monday, December 21, 2009

आ जाओ जिंदगी में नए साल की तरह....:)))

सभी पढ़नेवालों को क्रिसमस और नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ बतौर तोहफा एक ग़ज़ल पेश कर रही हूँ.अपनी राय से ज़रूर नवाजें -
गुज़रो न बस क़रीब से ख़याल की तरह
आ जाओ जिंदगी में नए साल की तरह

कब तक खफा रहेगा शजर अपनी शाख से
झुक कर ले मिलो कभी तो डाल की तरह

ये है अदब की बज़्म अदालत नहीं कोई
उठते हो बार बार क्यों सवाल की तरह

ये क्या हुआ कि आये बैठे और चल दिए
रुकिए ज़रा तो खुशनुमा ख्याल की तरह

जो दे सके ज़माना आशिकी के नाम पर
पेश आइये जहाँ में उस मिसाल की तरह

अचरज करे ज़माना जिसको देख उम्र-भर
हो जाओ जिंदगी में उस कमाल की तरह

ये क्या कहा है तुझको "किरण" आफताब ने
चेहरा तेरा है लाल क्यों गुलाल कि तरह
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डॉ कविता"किरण"


Thursday, November 26, 2009

इस कदर कोई सताए तो सही



गैर को ही पर सुनाये तो सही
शेर मेरे गुनगुनाये तो सही

जी नहीं हमसे रकीबों से सही
आपने रिश्ते निभाए तो सही

है मिली किस बात की हमको सज़ा
ये कोई हमको बताये तो सही

आँख बेशक हो गई नम फ़िर भी हम
जख्म खाकर मुस्कुराये तो सही

याद आए हर घड़ी अल्लाह हमें
इस कदर कोई सताए तो सही

इन अंधेरों में फ़ना होकर "किरण"
हम किसीके काम आए तो सही
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डॉ कविता"किरण"


Wednesday, November 18, 2009

कवियत्री कविता'किरण' के गीत संग्रह ' ये तो केवल प्यार है' का विमोचन


गत १६ नवम्बर को हिंदी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष प्रो.श्री अशोक चक्रधर की संस्था 'जय जैवन्ती' की और से फालना की कवियत्री डॉ कविता'किरण' के हिंदी गीत संग्रह 'ये तो केवल प्यार है' का विमोचन दिल्ली के इंडियन हेबिटेट सेंटर के गुलमोहर सभागार में आमंत्रित विद्वान साहित्यकारों और मीडिया कर्मियों की उपस्थिति में किया गया.
पुस्तक का विमोचन एन डी टी वी के श्री पंकज पचौरी,मुख्य अतिथि श्री रोमेश शर्मा और अशोक चक्रधेर जी के द्वारा किया गया.विमोचन के पश्चात् कवियत्री कविता'किरण'ने उक्त संग्रह में से कुछ गीतों का पाठ भी किया जिसकी सभी ने मुक्त कंठ से सराहना की।
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Thursday, November 12, 2009

जिंदगी को जुबान दे देंगे

कवयत्री डॉ कविता 'किरण 'उज्जैन में प्रसिद्द 'टेपा सम्मान ' लेते हुए

ग़ज़ल

जिंदगी
को
जुबान दे देंगे
धडकनों की कमान दे देंगे

हम तो मालिक हैं अपनी मर्ज़ी के
जी में आया तो जान दे देंगे

रखते हैं वो असर दुआओं में
हौसले को उड़ान दे देंगे

जो है सहमी पड़ी समंदर में
उस लहर को उफान दे देंगे

जिनको ज़र्रा नही मयस्सर है
उनको पूरा जहान दे देंगे

करके मस्जिद में आरती-पूजा
मंदिरों से अजान दे देंगे

मौत आती 'किरण' है जाए
तेरे हक में बयान दे देंगे
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डॉ.कविता'किरण'


Monday, November 9, 2009

कवियत्री डॉ. कविता'किरण'इलाहबाद में 'सर्वश्रेष्ठ कवयित्री' का अवार्ड ग्रहण करते हुए

ले जाओ अपना दिल भी अगर छोड़ गए हो!

'हुडदंग २००९'इलाहबाद होली के अवसर पर आयोजित कवि सम्मलेन के मंच पर

गज़ल

वापस लौटने की ख़बर छोड़ गए हो
मैंने सुना है तुम ये शहर छोड़ गए हो

दीवाने लोग मेरी कलम चूम रहे हैं
तुम मेरी ग़ज़ल में वो असर छोड़ गए हो

सारा ज़माना तुमको मुझ में ढूंढ रहा है
तुम हो की ख़ुद को जाने किधर छोड़ गए हो

दामन चुरानेवाले मुझको ये तो दे बता
क्यों मेरे पीछे अपनी नज़र छोड़ गए हो

मंजिल की है ख़बर रास्तों का है पता
ये मेरे लिए कैसा सफर छोड़ गए हो

ले तो गए हो जान-जिगर साथ 'किरण'
ले जाओ अपना दिल भी अगर छोड़ गए हो
*****************
डॉ कविता'किरण'

Tuesday, November 3, 2009

वक्त लिखता है वो नगमें


धूप है, बरसात है, और हाथ में छाता नहीं
दिल मेरा इस हाल में भी अब तो घबराता नहीं

मुश्किलें जिसमें न हों वो जिंदगी क्या जिंदगी
राह हो आसां तो चलने का मज़ा आता नहीं

चाहनेवालों में शिद्दत की मुहब्बत थी मगर
जिस्म से रिश्ता रहा, था रूह से नाता नहीं

मांगते देखा है सबको आस्मां से कुछ न कुछ
दीन हैं सारे यहाँ, कोई भी तो दाता नहीं

पा लिया वो सब कतई जिसकी नहीं उम्मीद थी
दिल जो पाना चाहता है बस वही पाता नहीं

जिंदगी अपनी तरह कब कौन जी पाया 'किरण'
वक्त लिखता है वो नगमें दिल जिसे गाता नहीं
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डॉ
कविता'किरण'