Sunday, July 3, 2011

वही रात-रात का जागना....(एक नज़्म)


वही रात-रात का जागना
वही ख़ुद को ख़ुद में तलाशना
वही बेख़ुदी, वही बेबसी
वही
अपने आप से भागना!

वही जिंदगी, वही रंज़ो-ग़म
वही
बेकली, वही आँख नम

वही रोज़ ही, इक दर्द से
करना
पड़े हमें सामना !


वही रोना इक-इक बात पर
तकिये से मुंह को ढांपकर
सर
रख के अपने हाथ पर

खाली
हवाओं को ताकना !

वही आंसुओं का है सिलसिला
वही
ज़ीस्त से शिकवा-गिला

वही इश्क़ सांवली रात से
वही
जुगनुओं को निहारना!

कभी
रो के काटी ये ज़िंदगी

कभी पा गये थोड़ी खुशी
कभी
आफताब का नूर था

कभी
छा गया कोहरा घना !

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डॉ.कविता 'किरण'

Monday, June 13, 2011

मेरी ख़ामोशी को लब,लब पर दुआ दे जायेगा.....


मेरी ख़ामोशी को लब,लब पर दुआ दे जायेगा
मुझको तन्हाई में हंसने की अदा दे जायेगा

ले गया मुझको चुराकर मुझसे जो पूछे बगैर
देख लेना एक दिन अपना पता दे जायेगा

छेड़कर चुपके-से इक दिन मेरी साँसों का सितार
वो दबी चिंगारियों को फिर हवा दे जायेगा

बंदिशें सब तोड़कर झूठी रिवाजों-रस्म
की
मेरे क़दमों को नया इक रास्ता दे जायेगा


देगा इक ताज़ा तरन्नुम जिंदगी की नज़्म को
मेरी
गज़लों को नया इक काफिया दे जायेगा

भूल
ना जाऊं कहीं भूले-से उसको इसलिए
मुझको अपनी चाहतों का वास्ता दे जायेगा

ए"किरण क्यों ना करे दिल उस
सनम का इंतज़ार
जो तबस्सुम लब को, दिल को हौसला दे जायेगा
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डॉ.कविता'किरण'




Sunday, May 29, 2011

अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ............


अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ
बरसातों में ठूंठ कहीं है हरा हुआ

करके गंगा-स्नान धो लिए सारे पाप
सोच रहे फिर सौदा कितना खरा हुआ

सीमा से ज्यादा जब बढ़ जाती है प्यास
खाली हो जाता है सागर भरा हुआ

फूलों के तन से ज्यादा मन घायल है
पत्थर को अहसास नहीं ये ज़रा हुआ

भूत-प्रेत और देता दोष हवाओं को
अपने अंतर्मन से आदम डरा हुआ

जब ऊपरवाला अपनी पर आएगा
रह जायेगा खेल 'धरा' का धरा हुआ
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डॉ कविता'किरण'

Monday, April 11, 2011

अनछुआ स्पर्श सिहरन दे गया.....[एक गीत श्रृंगार का]


संदली सांसों को चन्दन दे गया
अनछुआ स्पर्श सिहरन दे गया
पतझड़ी सपनो को सावन दे गया
अनछुआ स्पर्श सिहरन दे गया

मोम-सी पल-पल पिघलती रात में
जेठ में बरबस हुई बरसात में
लाजती आँखों में आँखें डालकर
कांपते हाथों को लेकर हाथ में

प्रीत का पावन प्रदर्शन दे गया
अनछुआ स्पर्श सिहरन दे गया

साँझ की निर्बंध अलकें बांधकर
मांग में ओठों से तारे टांगकर
मुग्ध कलिका पर भ्रमर कुछ यूँ हुआ
वर्जना के द्वार-देहरी लांघकर

भाल पर अधरों का अंकन दे गया
अनछुआ स्पर्श सिहरन दे गया

बाट प्रिय की जोहती मधुमास में
ज्यों हो चातक बादलों की आस में
लहर की बातों में बहकर गयी
प्रेम-तट पर प्राण तजती प्यास में

मीन को जल का प्रलोभन दे गया
अनछुआ स्पर्श सिहरन दे गया

आँख को स्वप्नों का अंजन दे गया
रूप को नयनों का दर्पण दे गया
साथ चलने का निमंत्रण दे गया
भेंट में पुश्तैनी कंगन दे गया

सात जन्मों का वो बंधन दे गया
अनछुआ स्पर्श सिहरन दे गया
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[गीत संग्रह 'ये तो केवल प्यार है' में से]
डॉ कविता'किरण'

Wednesday, March 30, 2011

सूरत है ख़ूबसूरत अंदाज़ आशिकाना...


सूरत है ख़ूबसूरत अंदाज़ आशिकाना
मेरा
नाम शायरी है मुझे दाद देते जाना

कभी गीत बन गयी हूँ कभी बन गयी ग़ज़ल मैं
मुझे
गुनगुनाने वालों कहीं सुर भूल जाना

दिल है अजीब शायर बस 'दर्द' लिख रहा है
फुरसत
इसे कहाँ जो लिखे प्यार का तराना

तो गये हैं अपने नगमों को बेचने हम
यहाँ
कौन कद्रदां है मुश्किल है ढूंढ पाना

भटके कहाँ-कहाँ हम यूँ ही महफ़िलें सजाने
ना जाने किस शहर में कब तक है आबोदाना

ग़म बाँटने को अपना लिक्खी है कुछ क़िताबें
जिनको पढ़ेगा लेकिन मेरे बाद ये ज़माना

चाहत के कागजों पर जब से "किरण" लिखा है
गीतों में ढल गये दिन रातें है शायराना
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कविता'किरण' ('तुम्ही कुछ कहो ना!' में से)

Thursday, March 17, 2011

फागुन की शाम आई फागुन की शाम..(सभी मित्रों को होली की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ इस बार एक गीत प्रस्तुत कर रही हूँ..)


(जयपुर में होली पर आयोजित महामूर्ख सम्मलेन में)

फागुन की शाम आई फागुन की शाम
मस्ती में डूबा है सारा ब्रज-धाम
फागुन की शाम आई फागुन की शाम
कण-कण में गूँज रहा कान्हा का नाम

डाली पे झूल रहे मीठे अंगूर हैं
पर बागबानों के हाथों से दूर है
कजरारे नैनों में मदिरा भरपूर है
लज्जा की लाली से मुखड़ा सिन्दूर है

रसवंती राधा है मादक हैं श्याम
फागुन की शाम आई फागुन की शाम


नैनों में नैनो से रस-रंग घोलें
मदमाते मौसम में तन-मन भिगो लें
रंगों से बात करें मुख से बोलें
होली में एक दूजे हो लें

हैं आम के आम गुठली के दाम
फागुन की शाम आई फागुन की शाम


जागी शिराओं में संवेदना है
विचलित है संयम विवश वर्जना है
तरुणाई पर हर मनोकामना है
हां का है दस्तूर ना-ना मना है

मनुहार में रूठने का क्या काम
फागुन की शाम आई फागुन की शाम

अनजानी आहट पे धडके जिया है
परदेस से लौट आया पिया है
कुछ द्वार ने देहरी से कहा है
संकोच ने फिर समर्पण किया है

पल-पल प्रणय हो लगे विराम
फागुन
की शाम आई फागुन की शाम


तन में तरंग, बजे मन में म्रदंग है
अम्बर के उर में भी जागी उमंग है
होली का अवसर है पावन प्रसंग है
और भावनाओं ने भी पी ली भंग है

कर कामनाओं की ढीली लगाम
फागुन की शाम आई फागुन की शाम
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(गीत संग्रह "ये तो केवल प्यार है" में से )
डॉ कविता'किरण'


Monday, February 14, 2011

उनसे आँखों ही में होती है लड़ाई मेरी....




उनसे आँखों ही में होती है लड़ाई मेरी
थाम लेते हैं सनम जब भी कलाई मेरी

आईनों!शोख मिजाजी में हया के तेवर
मुझको तस्वीर नई तुमने दिखाई मेरी

इन्तेहाँ देखो शरारत की भरी महफ़िल में
उसने गा-गाके ग़ज़ल मुझको सुनाई मेरी

मैंने रो-रोके जुदाई में यहाँ जाँ दे दी
बेवफा याद भी तुझको नहीं आई मेरी

भरी बरसात में यूँ छोडके जानेवाले
तुझको भी खूब सताएगी जुदाई मेरी

मुझको सूरज ने उतारा है उजाले देकर
"किरण"आज ज़मीं पर हो बधाई मेरी
*****कविता 'किरण'******

Tuesday, February 1, 2011

दुबई-यात्रा 27 जन २०११....



With Shayer Dr. Peerzada Qasim ( The vice chancellor of Qarachi university,Pakistan) Dubai 27 jan २०११

भारतीय
दूतावास की और से 27 जन 2011 को गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर "दुबई शौपिंग फेस्टिवल' दुबई, में आयोजित कवि सम्मलेन-मुशायरे में इस बार मैं भी काव्य-पाठ हेतु आमंत्रित की गयी थी....पाकिस्तानी शायर डॉ. पीरजादा कासिम एक अज़ीम शख्सीयत हैं उनके साथ काव्य-पाठ करना अपने आप में एक यादगार पल था..दुबई-यात्रा के कुछ और यादगार पल यहाँ जल्द ही सभी मित्रों के साथ बाँटना चाहूंगी ....बस उस ऐतिहासिक कार्यक्रम के कुछ चित्रों की प्रतीक्षा है ...:)))

Friday, January 21, 2011

दिल जलता है दीपक जैसे....कवियत्री डॉ कविता'किरण' का 27 जन 2011 को दुबई में काव्य-पाठ--...

Bharteeya dootawas ki aur se 27 jan 2011 ko Gantantra diwas ke shubh avsar per "Dubai shopping festival' DUBAI mein aayojit kavi sammelan-mushayre mein iss baar main bhi kavy-path hetu aamantrit kee gayi hun....sath hi 24 jan ko Gaziyabad kavi sammelan mein aur 25 jan ko Jaipur(sarvbhasha sadbhavna kavi sammelan) mein bhag lekar apni matra bhasha Rajasthani ka pratinidhitv bhi karungi. ..aap sabhi mitron ki shubhkamnayen apekshit hain....kavita'kiran'
पहुंचेगा मंजिल तक जैसे
दिल जलता है दीपक जैसे

मुड-मुड कर वो देख रहा है
उसको मुझ पर हो शक जैसे

खनक उठे दिल के दरवाज़े
उसने दी हो दस्तक जैसे

सीने में इक ख़ामोशी है
सहम गयी हो धक्-धक् जैसे

आज जिया है वो जी-भरकर
मौत टली हो कल तक जैसे

हर मंजिल पर वो ही वो है
हर रस्ता है उस तक जैसे

'किरण' सताए वो कुछ ऐसे
मुझ पर हो उसका हक जैसे
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डॉ कविता'किरण'






Thursday, January 6, 2011

श्रंगार का एक छंद...




ऋतुओं की रानी हूँ मै शरद सुहानी हूँ
फागुन में होली रस-रंग की बहार हूँ!
चमकूँ बिजुरिया-सी बरसूँ बदरिया-सी
सावन में रिमझिम बरखा-बहार हूँ!
जेठ की दुपहरी हूँ चांदनी रुपहरी हूँ
वासंती हवा हूँ मंद-मंद मै बयार हूँ!
प्यार-मनुहार हूँ अंगार हूँ श्रंगार हूँ
चढ़के उतरे वो प्रीत का खुमार हूँ!
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कविता'किरण'