Thursday, November 4, 2010

दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...


होली और दीवाली पर तो आते-जाते रहा करें
कम से कम त्योहारों पर हम इक दूजे से मिला करें

बारह महीनों में इक दिन आता है ये शुभ दिन हम आज
तन के, मन के, धन के सारे रिश्तों का हक अदा करें

दुःख तो जीवन का हिस्सा है दुःख का सोग मनाना क्या
मातम के मौसम को हम मन में आने से मना करें

काल-चक्र में कहीं खो गये कुछ अपने, कुछ अपनापन
दीपों कि जगमग में उन बिछड़े नातों का पता करें

जाने
कितने क़र्ज़ चढ़ाये और जताया कभी नहीं
हम जिसकी शाखें हैं उस बरगद को पानी दिया करें

क्या हो कभी-कभी जो दरिया जाये प्यासे के पास
बूंदे - सागर बैठ पुरानी यादें ताज़ा किया करें

चलो गिरा दें दीवारें अब अहंकार कि अंतस से
गैर भी अपने बन जायेंगे मन से 'मैं' को विदा करें

घोर तिमिर से लड़ते नन्हे दीपक से ये बोल 'किरण'
महलों से मोहलत लेकर झोपड़ियों में भी जला करें
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डॉ कविता'किरण'

Tuesday, October 19, 2010

दिल से मिटती नहीं चुभन उसकी....


दिल से मिटती नहीं चुभन उसकी
रूह पर नक्श है छुअन उसकी

कभी मेले, कभी अकेले में
याद आती रही कहन उसकी

सर्द साँसों को मिल गयी राहत
आँच देती रही तपन उसकी

मैं मुकम्मल ग़ज़ल-सी हो जाऊं
शेर मेरे हों और कहन उसकी

जो भी जाये वहीँ का हो जाये
इतनी दिलकश है अंजुमन उसकी

किस क़दर खुश है मेरा दीवाना
हो गयी जैसे हो 'किरण' उसकी
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डॉ. कविता'किरण'




Wednesday, September 29, 2010

कब तलक काबा ओ काशी जायेगा.....


कब तलक काबा काशी जायेगा
क्या कभी खुद की तरफ भी जायेगा?

हमसफ़र होगी फ़क़त नेकी_बदी
साथ में पंडित
ना काजी जायेगा

एक हद तक इम्तिहाँ देने के बाद
सब्र का प्याला छलक ही जायेगा

क्यों मसीहा की लगाये हो उम्मीद
है कोई ज़ख्म जो सी जायेगा

गम कर दम तोड़ते मेरे जिगर
दर्द के छूते ही तू जी जायेगा

इन् हरे पेड़ों से अमृत छीनकर
सोचते हो वो ज़हर पी जायेगा?
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डॉ कविता'किरण'



Wednesday, September 15, 2010

कविताकिरण -नेपाल -यात्रा (एक रिपोर्ट)



दिनांक 7,8 9 सितंबर 2010 को काठमांडू में त्रिदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन नेपाल,काठमांडू स्थित भारतीय राजदूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया. इस संगोष्ठी का शुभारंभ हास्य कवि सम्मेलन से होना था.इस हास्य कवि सम्मेलन में सम्मलित होने वाले कवियों में हास्य कवि सम्राट सर्वश्री सुरेंद्र शर्मा, महेंद्र शर्मा, अरुण जैमिनी, दीपक गुप्ता,कविता"किरण",विवेक गौतम और नेपाली कवि सर्वश्री लक्ष्मण गाम्नागे और शैलेंद्र सिंखडा थे.इस हास्य कवि सत्र का उद्घाटन नेपाली राष्ट्रपति महामहिम डॉ. श्री रामवरण यादव द्वारा दीप प्रज्ज्व्लित करके किया गया. इस उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रग्या प्रतिष्ठान के श्री बैरागी काइंला द्वारा की गई.स्वागत उपकुलपति श्री गंगा प्रसाद उप्रेती द्वारा किया गया. इस अवसर पर आमंत्रित विशिष्ट अतिथियों में नेपाली शिक्षा मंत्री, संस्कृति मंत्री और भारतीय राजदूत श्री राकेश सूद थे जिन्होंने आशीर्वचन और अपने-अपने उद्बोधन भाषण दिए.नेपाली राष्ट्रपति ने केवल इस मैत्रीपूर्ण हास्य कवि सम्मेलन के लिए भारतीय राजदूतावास काठमांडू और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली को बधाई दी बल्कि उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ हास्य का लुत्फ भी लिया.

Saturday, September 4, 2010

(५ से १० सित।तक नेपाल-यात्रा पर रहूंगी. सभी मित्रों की शुभकामनाये और आशीर्वाद अपेक्षित है...)

दिनांक 6,7,8 सितम्बर2010 को नेपाल की राजधानी काठमांडू में आयोजित होनेवाले तीन
दिवसीय हिंदी समारोह में भाग लेने हेतु "भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद्"( ICCR)
दिल्ली, की ओर से भेजे जानेवाले प्रतिनिधि मंडल में फालना,राजस्थान की
कवयत्री डॉ कविता"किरण" को भी शामिल किया गया है। (५ से १० सित।तक
नेपाल-यात्रा पर रहूंगी. सभी मित्रों की शुभकामनाये और आशीर्वाद अपेक्षित है...)

Wednesday, September 1, 2010

श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये



ओ साँवरिया!

कैसे काटूं ये कोरी कुआँरी उमरिया
ओ सांवरिया!
अब तो अधरों पे धर ले बनाके बाँसुरिया
ओ सांवरिया!

राह तकते नयन मेरे पथरा गये
आ गये सामने तुम तो घबरा गये

लाज के मारे मर ही न जाए गुजरिया
ओ साँवरिया!

बिन तेरे ब्रज की गलियाँ भी सूनी लगे
है जरा-सी मगर पीर दूनी लगे

फोडने आ जा पनघट पे छलके गगरिया
ओ साँवरिया!

रास संग गोपियों के रचाई नहीं
नींद कितने दिनों से चुराई नहीं

आ जा जमना किनारे पुकारे बावरिया
ओ साँवरिया!
कर दे बेसुध मोहे मुरली की तान से
जान चाहे चली जाए फिर जान से

आके ले ले ओ निर्मोही मोरी खबरिया
ओ साँवरिया!

बाग में पेड पर पक गये आम हैं
दूर मेरी नजर से मेरे ष्याम हैं

द्वार पे है लगी कब से प्यासी नजरिया
ओ सांवरिया!

जीत पाया नहीं जो हृदय श्याम का
राधिके! रूप तेरा ये किस काम का

मुँह चिढाए मोहे सूनी-सूनी सजरिया
ओ साँवरिया!

कैसे काटूं ये कोरी कुआँरी उमरिया
ओ साँवरिया!
अब तो अधरों पे धर ले बनाके

-कविता किरण

Sunday, August 22, 2010

रक्षाबंधन के शुभ अवसर पर ***********

 
नहीं चाहिए मुझको हिस्सा माँ-बाबा की दौलत में
चाहे वो कुछ भी लिख जाएँ
भैया मेरे ! वसीयत में

नहीं चाहिए मुझको झुमका चूड़ी पायल और कंगन 
नहीं चाहिए अपनेपन की कीमत पर बेगानापन 
 
 मुझको नश्वेर चीज़ों की दिल से कोई दरकार नहीं 
संबंधों की कीमत पर कोई सुविधा स्वीकार नहीं 

माँ के सारे गहने-कपड़े  तुम भाभी को दे देना
बाबूजी का जो कुछ है सब ख़ुशी ख़ुशी तुम ले लेना

 
चाहे पूरे वर्ष कोई भी चिट्ठी-पत्री मत लिखना

मेरे स्नेह-निमंत्रण का भी चाहे मोल  नहीं करना

 
नहीं भेजना
तोहफे मुझको चाहे तीज-त्योहारों पर  
पर  थोडा-सा हक दे देना बाबुल के गलियारों पर

रूपया पैसा कुछ ना चाहूँ..बोले मेरी राखी है
आशीर्वाद मिले मैके से मुझको इतना काफी है


 तोड़े से भी ना टूटे जो ये ऐसा मन -बंधन है 
इस  बंधन को सारी दुनिया कहती रक्षाबंधन है 

तुम भी इस कच्चे धागे का मान ज़रा-सा रख लेना
  कम से कम राखी के दिन बहना का रस्ता तक लेना

****************
कविता"किरण"
***रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएं***

Wednesday, August 11, 2010

माया के परदे में क्या मन दिखता है कहीं धूप में तारों का तन दिखता है


माया के परदे में क्या मन दिखता है
कहीं धूप में तारों का तन दिखता है

जब भी मन करता है जी भरकर बरसे
बरसातों को मेरा आँगन दिखता है

गये सैर को अपने अंतरमन की ओर
साँपों से लिपटा चन्दनवन दिखता है

अर्जुन को दिखती है बस चिड़िया की आँख
और प्यासे चातक को सावन दिखता है

किया सामना जब-जब भी आईने का
अन्जाना बेगाना दर्पण दिखता है

हाथ जुड़े मजदूरों के मज़बूरी में
पर दिखने को सबको वंदन दिखता है
****************
(तुम्ही कुछ कहो ना! में से.....)
डॉ कविता'किरण'

Friday, July 30, 2010

छुपके सिरहाने में रोते हैं , लोग दीवाने क्यों होते हैं



छुपके सिरहाने में रोते हैं
लोग दीवाने क्यों होते हैं

हर गहरी साजिश के पीछे
दोस्त पुराने क्यों होते हैं

बन गये दिल पर बोझ जो ऐसे
साथ निभाने क्यों होते हैं

हर युग में दिल के शीशे को
पत्थर खाने क्यों होते हैं

जब भी वक़्त बुरा आता है
अश्क बहाने क्यों होते हैं

जो रंजो-गम नाप पायें
वो पैमाने क्यों होते हैं

अश्कों से तर आँख हो फिर भी
लब मुस्काने क्यों होते हैं

'किरण' तेरी तिरछी नज़रों के
हम ही निशाने क्यों होते हैं
**************
डॉ कविता'किरण'

Tuesday, July 20, 2010

'दर्द'! तुझको पनाह देने को ......


'दर्द'!
तुझको
पनाह
देने को
एक दिल था
उसे भी दे डाला
**************
डॉ कविता'किरण'


Sunday, July 4, 2010

चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा




चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा
मिटटी का दामन कितना तरसा होगा

सागर भरकर भी ना प्यासी रह जाऊं
गागर के भीतर कोई डर-सा होगा

बादल सोच रहा है अबके बारिश में
जाने कितनी बूंदों का खर्चा होगा

कब आएगा दिन जब मीठी झीलों में
रेगिस्तानों का कोई चर्चा होगा

किसने सोचा था ये जीने से पहले
इतना मुश्किल जीवन का परचा होगा

मेरे घर को आग लगाने वाले सुन
तेरा घर भी तो मेरे घर-सा होगा
****************
डॉ कविता"किरण"