Thursday, January 6, 2011

श्रंगार का एक छंद...




ऋतुओं की रानी हूँ मै शरद सुहानी हूँ
फागुन में होली रस-रंग की बहार हूँ!
चमकूँ बिजुरिया-सी बरसूँ बदरिया-सी
सावन में रिमझिम बरखा-बहार हूँ!
जेठ की दुपहरी हूँ चांदनी रुपहरी हूँ
वासंती हवा हूँ मंद-मंद मै बयार हूँ!
प्यार-मनुहार हूँ अंगार हूँ श्रंगार हूँ
चढ़के उतरे वो प्रीत का खुमार हूँ!
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कविता'किरण'

4 comments:

  1. • सृष्टि को एक नई प्रविधि से देखने की तरक़ीब!

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  2. प्यार-मनुहार हूँ अंगार हूँ श्रंगार हूँ
    चढ़के न उतरे वो प्रीत का खुमार हूँ!
    सादर प्रणाम !
    प्रकर्ति को नए शब्दों में ढाला है , जाकब कि यहाँ तो अभी बीकानेर में '' धुवे में लिपटा मेरा शहर , सूरज रजाई ओढ़े बैठा है बादलो में '' ऐसा लग रहा . है , बधाई ,
    सादर

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  3. समर्पण के साथ लिखी सुन्दर गजल के लिए बधाई!
    नये साल की मुबारकवाद कुबूल करें!

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  4. waah kya baat hai kavita ji...
    hindi ke shabdon ka kya manmohak upyog kiya hai aapne...
    dil khush ho gaya!!

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