Monday, February 14, 2011

उनसे आँखों ही में होती है लड़ाई मेरी....




उनसे आँखों ही में होती है लड़ाई मेरी
थाम लेते हैं सनम जब भी कलाई मेरी

आईनों!शोख मिजाजी में हया के तेवर
मुझको तस्वीर नई तुमने दिखाई मेरी

इन्तेहाँ देखो शरारत की भरी महफ़िल में
उसने गा-गाके ग़ज़ल मुझको सुनाई मेरी

मैंने रो-रोके जुदाई में यहाँ जाँ दे दी
बेवफा याद भी तुझको नहीं आई मेरी

भरी बरसात में यूँ छोडके जानेवाले
तुझको भी खूब सताएगी जुदाई मेरी

मुझको सूरज ने उतारा है उजाले देकर
"किरण"आज ज़मीं पर हो बधाई मेरी
*****कविता 'किरण'******

14 comments:

  1. वाह ! इतनी ख़ूबसूरत ग़ज़ल का एक-एक शेर कमाल का लगा. आभार सम्मानिया कविता जी !

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  2. सुन्दर गजल!
    प्रेम दिवस की शुभकामनाएँ!

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  3. बहुत ही खूबसूरत नज़्म लिखी है…………प्रेम दिवस की शुभकामनाएँ!

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  4. अतीव सुंदर ग़ज़ल..
    बधाई.

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  5. bout he aacha laga aapka post...

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  6. मेम !
    प्रणाम !
    एक अलग मूड कि सुंदर ग़ज़ल है .
    साधुवाद !
    सादर !

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  7. aapki tareef me kya kahun ! bahut shandar gazal .

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  8. अती सुंदर ग़ज़ल|धन्यवाद|

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  9. अच्छी ग़ज़ल है कविता जी ...
    आपको दुबई मुशायरे में सुना बहुत अच्छा लगा ...

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  10. मुझको सूरज ने उतारा है उजाले देकर ...
    बहुत सीधी और अच्छी गजल ! शुभकामनाएँ !

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  11. कविता जी फागुनी रंग में सराबोर इस ग़ज़ल के लिए तहे दिल से दाद कबूल करें...

    नीरज

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