Sunday, May 29, 2011

अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ............


अमृत पीकर भी है मानव मरा हुआ
बरसातों में ठूंठ कहीं है हरा हुआ

करके गंगा-स्नान धो लिए सारे पाप
सोच रहे फिर सौदा कितना खरा हुआ

सीमा से ज्यादा जब बढ़ जाती है प्यास
खाली हो जाता है सागर भरा हुआ

फूलों के तन से ज्यादा मन घायल है
पत्थर को अहसास नहीं ये ज़रा हुआ

भूत-प्रेत और देता दोष हवाओं को
अपने अंतर्मन से आदम डरा हुआ

जब ऊपरवाला अपनी पर आएगा
रह जायेगा खेल 'धरा' का धरा हुआ
*********
डॉ कविता'किरण'

17 comments:

  1. फूलों के तन से ज्यादा मन घायल है
    पत्थर को अहसास नहीं ये ज़रा हुआ

    बहुत सुन्दर गज़ल

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  2. भूत-प्रेत और देता दोष हवाओं को
    अपने अंतर्मन से आदम डरा हुआ
    kitni sachchai hai aapke inshabdon me !
    bahut sateek bat kahi hai aapne Kavita ji .aabhar

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  3. बहुत सुन्दर ग़ज़ल!
    बिम्बों के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया है आपने!

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  4. सुन्दर बिम्बो के माध्यम से ज़िन्दगी की हकीकतें बयाँ कर दीं………उम्दा प्रस्तुति।

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  5. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 31 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  6. करके गंगा-स्नान धो लिए सारे पाप
    सोच रहे फिर सौदा कितना खरा हुआ

    वाह कविता जी, बहुत सुन्दर ग़ज़ल है और ये शेर तो लाजवाब है !

    ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?

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  7. bahut badhiya ghazal..
    aapka ek alag andaaz..badhai..

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  8. कविता किरण जी!
    आपकी शानदार रचना पढ़ कर सुखनुभूति हुई।
    और एक मिसरा बन गया जो पेश है-
    =========================
    सोचा था अपनी फसल खड़ी है गेहूँ की-
    पर गेहूँ, गेहूँ रहा नहीं, बाजरा हुआ।
    ========================
    सद्भावी- डा० डंडा लखनवी

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  9. करके गंगा-स्नान धो लिए सारे पाप
    सोच रहे फिर सौदा कितना खरा हुआ
    बहुत सुन्दर ग़ज़ल!
    बिम्बों के माध्यम से बहुत कुछ कह दिया है आपने!

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  10. गजल हो या गीत किरण जी के शब्दों जादू हैं .....।

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  11. सुश्री किरणजी , सप्रेम अभिवादन! अच्छे निबंध या कविता लेखन की खोज मे इधर उधर भटकता Blogmanch पर पहुंचा और उसके सहारे आपके ब्लॉग पर। बहुत से पेज देख चुका था और आपके पेज को सिर्फ़ सरसरी नज़र से देख कर निकल लेता कि थमक गया। पूरा का पूरा ही पढ़ गया। Position ये है कि YE DIL MAANGE MORE . इनको फ़िर फ़िर और फ़िर देखने आय चाहूंगा। इतने सुन्दर कृतित्व के लिये मेरी अन्तस की शुभ-कामनाएं स्वीकार कीजिये। आपके संकलन का कहीं प्रकाशन हुआ हो तो बराए मेहरबानी vijaykayalvijaykayal@gmail.com पर सूचना दें। आपकी रचनाएं अद्भुत , अनुपम और सर्वोत्कृष्ट हैं , इनको शेयर करने के लिये आपका साधुवाद !

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