Thursday, March 1, 2012

वत्सला से वज्र में ढल जाऊंगी, मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊंगी....


वत्सला से वज्र में ढल जाऊंगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊंगी
दंभ के आकाश को छल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी

पतझरों की पीर की पाती सही
वेदना के वंश की थाती सही
कल मेरा स्वागत करेगा सूर्योदय
आज दीपक की बुझी बाती सही

फिर स्वयं के ताप से जल जाऊँगी
मैं नही हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी

मन मरुस्थल नेह निर्जल ताल है
रूप दिनकर का हुआ विकराल है
है विकल विश्वास विचलित प्राण हैं
कामना की देह सूखी डाल है

नीर-निश्चय से पुनः फल जाऊँगी

मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी

आत्म-बल का मै अखंडित जाप हूँ
प्रेरणा के गीत का आलाप हूँ
अपने स्वाभिमान की हूँ सारथी
स्वयंसिद्धा अपना परिचय आप हूँ

पुरुष की प्रभुताओं को खल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी

सभ्यता मुझसे है मैं हूँ संस्कृति
आत्म गौरव की हूँ अनुपम आकृति
अपनी आभा का मुझे आभास है
लय हूँ जीवन की समय की हूँ गति

पीर के आँचल में भी पल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी

तज के अब नारीत्व के संत्रास को
मैं रचूँगी इक नए इतिहास को
एक मंगल भोर का आव्हान कर
प्राण में भर लूँगी हर्ष-उल्लास को

भाल पर तम के 'किरण' मल जाऊँगी
मैं नहीं हिमकण हूँ जो गल जाऊँगी
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गीत संग्रह 'ये तो केवल प्यार है' में से

7 comments:

  1. आखिरी पैरा मे सब कह दिया ……………बेहद शानदार अभिव्यक्ति।

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  2. वज्र बनना ही होगा ॥सुंदर अभिव्यक्ति

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  3. बहुत ही खूबसूरत रचना।

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  4. सम्वेदना और आक्रोश का संगम।
    आत्मविश्वास और स्वयं का नाम
    सार्थक करती उत्तम रचना।
    घन्यवाद।

    आनन्द विश्वास।

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  5. आप सभी मित्रों की सराहना के लिए मैं हिरदय से आभारी हूँ ..धन्यवाद!!

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  6. बहुत सुंदर ... बढ़िया !!

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