Sunday, July 4, 2010

चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा




चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा
मिटटी का दामन कितना तरसा होगा

सागर भरकर भी ना प्यासी रह जाऊं
गागर के भीतर कोई डर-सा होगा

बादल सोच रहा है अबके बारिश में
जाने कितनी बूंदों का खर्चा होगा

कब आएगा दिन जब मीठी झीलों में
रेगिस्तानों का कोई चर्चा होगा

किसने सोचा था ये जीने से पहले
इतना मुश्किल जीवन का परचा होगा

मेरे घर को आग लगाने वाले सुन
तेरा घर भी तो मेरे घर-सा होगा
****************
डॉ कविता"किरण"


21 comments:

  1. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है ... हर शेर कुछ नयी कहानी बोलता है ...

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  2. बेहतरीन्…………लाजवाब गज़ल्।

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  4. कविताजी, यूँ तो इस खूबसूरत गजल का हरेक शेर नायाब है, पर इन दो शेरों में तो आपने गजब ही कर डाला है-
    चट्टानों पर जब पानी बरसा होगा
    मिट्टी का दामन कितना तरसा होगा
    मेरे घर को आग लगाने वाले सुन
    तेरा घर भी तो मेरे घर-सा होगा
    इन शेरों का हर एक लफ्ज इस प्रकार जडा गया है, जैसे सुनार
    आभूषण में रत्न जडता है। बधाई और शुभकामनायें।

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  5. वाह बहुत सुंदर नज़्म. पहली बार आपके ब्लॉग पर आई आपको पढ़ना बहुत अच्छा लगा. कोशिश रहेगी की आपको पढ़ती रहू.आप बहुत अच्छा लिखती हैं.

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  6. मर्मस्पर्शी रचना....... बधाई स्वीकारें।
    सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

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  7. बादल सोच रहा है, अबके बारिश में
    जाने कितनी बूंदों का खर्चा होगा
    ग़ज़ल पढ़ते-पढ़ते नज़र बार-बार इसी शेर पर
    आ कर ठहर जाती है ....
    बहुत उम्दा ख़याल लफ़्ज़ों में ढाला है ...वाह !
    मुबारकबाद .

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  8. कविता जी बहुत शशक्त ग़ज़ल कही है आपने...बधाई...
    नीरज

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  9. कब आएगा दिन जब मीठी झीलों में
    रेगिस्तानों का कोई चर्चा होगाकविता जी ,
    प्रणाम !
    बेहतरीन लगी ग़ज़ल , हर शेर अच्छा है मगर मेरी पसंद का शेर आप कि नज़र किया है ,
    साधुवाद

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  10. आप की रचना 9 जुलाई के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपने सुझाव देकर हमें प्रोत्साहित करें.
    http://charchamanch.blogspot.com
    आभार
    अनामिका

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  11. आप सभी की सकारात्मक टिप्पणियों का बहुत बहुत शुक्रिया .कृपया आगे भी आते रहें और हौसला बढ़ाते रहें

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  12. किसने सोचा था ये जीने से पहले
    इतना मुश्किल जीवन का परचा होगा...

    behad achchha laga ye to....
    jeevan ka parcha wakai bada mushkil prateet hota hai.

    Sundar lekhan

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  13. "किसने सोचा था ये जीने से पहले
    इतना मुश्किल जीवन का परचा होगा

    मेरे घर को आग लगाने वाले सुन
    तेरा घर भी तो मेरे घर-सा होगा"

    आभार

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  14. बहुत सुंदर ... अद्भुद ...

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  15. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल ....
    लाजवाब !!!

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  16. very nice...
    heart touching....

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  17. आपकी ग़ज़लें बहुत प्रभावशाली होतीं है । एक सुझाव है : जैसा कि मेरी जानकारी है यदि ग़ज़ल के मतले में काफ़िया बरसा और तरसा आ रहा है तो पूरी गज़ल में भी उससे मिलते जुलते काफ़िए जैसे फ़रसा, डर सा आने चाहिए , उसमें परचा या खर्चा दोषपूर्ण माने जाते हैं

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  18. bahut khubsurat poem hai aapki vah!!

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