Tuesday, February 1, 2011

दुबई-यात्रा 27 जन २०११....



With Shayer Dr. Peerzada Qasim ( The vice chancellor of Qarachi university,Pakistan) Dubai 27 jan २०११

भारतीय
दूतावास की और से 27 जन 2011 को गणतंत्र दिवस के शुभ अवसर पर "दुबई शौपिंग फेस्टिवल' दुबई, में आयोजित कवि सम्मलेन-मुशायरे में इस बार मैं भी काव्य-पाठ हेतु आमंत्रित की गयी थी....पाकिस्तानी शायर डॉ. पीरजादा कासिम एक अज़ीम शख्सीयत हैं उनके साथ काव्य-पाठ करना अपने आप में एक यादगार पल था..दुबई-यात्रा के कुछ और यादगार पल यहाँ जल्द ही सभी मित्रों के साथ बाँटना चाहूंगी ....बस उस ऐतिहासिक कार्यक्रम के कुछ चित्रों की प्रतीक्षा है ...:)))

Friday, January 21, 2011

दिल जलता है दीपक जैसे....कवियत्री डॉ कविता'किरण' का 27 जन 2011 को दुबई में काव्य-पाठ--...

Bharteeya dootawas ki aur se 27 jan 2011 ko Gantantra diwas ke shubh avsar per "Dubai shopping festival' DUBAI mein aayojit kavi sammelan-mushayre mein iss baar main bhi kavy-path hetu aamantrit kee gayi hun....sath hi 24 jan ko Gaziyabad kavi sammelan mein aur 25 jan ko Jaipur(sarvbhasha sadbhavna kavi sammelan) mein bhag lekar apni matra bhasha Rajasthani ka pratinidhitv bhi karungi. ..aap sabhi mitron ki shubhkamnayen apekshit hain....kavita'kiran'
पहुंचेगा मंजिल तक जैसे
दिल जलता है दीपक जैसे

मुड-मुड कर वो देख रहा है
उसको मुझ पर हो शक जैसे

खनक उठे दिल के दरवाज़े
उसने दी हो दस्तक जैसे

सीने में इक ख़ामोशी है
सहम गयी हो धक्-धक् जैसे

आज जिया है वो जी-भरकर
मौत टली हो कल तक जैसे

हर मंजिल पर वो ही वो है
हर रस्ता है उस तक जैसे

'किरण' सताए वो कुछ ऐसे
मुझ पर हो उसका हक जैसे
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डॉ कविता'किरण'






Thursday, January 6, 2011

श्रंगार का एक छंद...




ऋतुओं की रानी हूँ मै शरद सुहानी हूँ
फागुन में होली रस-रंग की बहार हूँ!
चमकूँ बिजुरिया-सी बरसूँ बदरिया-सी
सावन में रिमझिम बरखा-बहार हूँ!
जेठ की दुपहरी हूँ चांदनी रुपहरी हूँ
वासंती हवा हूँ मंद-मंद मै बयार हूँ!
प्यार-मनुहार हूँ अंगार हूँ श्रंगार हूँ
चढ़के उतरे वो प्रीत का खुमार हूँ!
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कविता'किरण'

Monday, December 20, 2010

हर तरफ उनके ख़यालों की महकती बज़्म है......


हर तरफ उनके ख़यालों की महकती बज़्म है
आजकल ये दिन शुरू उन से उन्ही पर ख़त्म है

आप ही से हर ग़ज़ल है आप ही की नज़्म है
आप ही हैं शम्मे-महफ़िल आप ही की बज़्म है

उनकी हसरत, हम रहें, हरदम नज़र के सामने
प्यार  में मिलकर बिछड़ना, ये भी कोई रस्म है

 
 रु-ब -रु वो आयेंगे तो जाने क्या हो जायेगा
जब  तस्सवुर ही से उनके  हम को आती  शर्म है

इस तरह महसूस होती है जुदाई आपकी  

 रूह के बिन  जिस्म गोया  नूर के बिन चश्म  है

  मुफलिसों की ज़िदगी है एक जलती दोपहर 
 धूप है शिद्दत की सर पे और हवा भी गर्म है 

यूँ तो लिखे हैं 'किरण' अशआर हमने बेशुमार 
जब तलक  वो पढ़ लें,लगती अधूरी नज़्म है
 
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डॉ कविताकिरण'

Tuesday, December 7, 2010

मेरी सांसों में रु-ब-रु हो जा...(एक सूफीयाना ग़ज़ल पेश है..)


मेरी सांसों में रु--रु हो जा
मेरे जीने की आरज़ू हो जा

हर तरफ तू ही तू दिखाई दे
हर तरफ सिर्फ तू ही तू हो जा

एक दूजे के दोनों हो जाएँ
मैं तेरी और मेरा तू हो जा

खुद को देखूं तो तुझको पा जाऊं
आईना बनके चार सू हो जा

मेरी खामोशियाँ पिघल जाएँ

वो मुहब्बत की गुफ़्तगू हो जा

खुशबुओं की तरह महक उठ्ठूं

मेरे गुलशन की रंगों बू हो जा

जाँ से ज्यादा अजीज़ हो मेरे
मेरी उल्फत की आबरु हो जा

जो अभी तक हो सका कोई
मेरे महबूब! वो ही तू हो जा

इससे पहले मैं ख़त्म हो जाऊं
मेरी जिंदगी! शुरू हो जा

बारगाहे-सनम में जाना है

तो 'किरण'तू भी बा-वज़ू हो जा

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डॉ कविता'किरण'



Thursday, November 4, 2010

दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...


होली और दीवाली पर तो आते-जाते रहा करें
कम से कम त्योहारों पर हम इक दूजे से मिला करें

बारह महीनों में इक दिन आता है ये शुभ दिन हम आज
तन के, मन के, धन के सारे रिश्तों का हक अदा करें

दुःख तो जीवन का हिस्सा है दुःख का सोग मनाना क्या
मातम के मौसम को हम मन में आने से मना करें

काल-चक्र में कहीं खो गये कुछ अपने, कुछ अपनापन
दीपों कि जगमग में उन बिछड़े नातों का पता करें

जाने
कितने क़र्ज़ चढ़ाये और जताया कभी नहीं
हम जिसकी शाखें हैं उस बरगद को पानी दिया करें

क्या हो कभी-कभी जो दरिया जाये प्यासे के पास
बूंदे - सागर बैठ पुरानी यादें ताज़ा किया करें

चलो गिरा दें दीवारें अब अहंकार कि अंतस से
गैर भी अपने बन जायेंगे मन से 'मैं' को विदा करें

घोर तिमिर से लड़ते नन्हे दीपक से ये बोल 'किरण'
महलों से मोहलत लेकर झोपड़ियों में भी जला करें
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डॉ कविता'किरण'

Tuesday, October 19, 2010

दिल से मिटती नहीं चुभन उसकी....


दिल से मिटती नहीं चुभन उसकी
रूह पर नक्श है छुअन उसकी

कभी मेले, कभी अकेले में
याद आती रही कहन उसकी

सर्द साँसों को मिल गयी राहत
आँच देती रही तपन उसकी

मैं मुकम्मल ग़ज़ल-सी हो जाऊं
शेर मेरे हों और कहन उसकी

जो भी जाये वहीँ का हो जाये
इतनी दिलकश है अंजुमन उसकी

किस क़दर खुश है मेरा दीवाना
हो गयी जैसे हो 'किरण' उसकी
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डॉ. कविता'किरण'




Wednesday, September 29, 2010

कब तलक काबा ओ काशी जायेगा.....


कब तलक काबा काशी जायेगा
क्या कभी खुद की तरफ भी जायेगा?

हमसफ़र होगी फ़क़त नेकी_बदी
साथ में पंडित
ना काजी जायेगा

एक हद तक इम्तिहाँ देने के बाद
सब्र का प्याला छलक ही जायेगा

क्यों मसीहा की लगाये हो उम्मीद
है कोई ज़ख्म जो सी जायेगा

गम कर दम तोड़ते मेरे जिगर
दर्द के छूते ही तू जी जायेगा

इन् हरे पेड़ों से अमृत छीनकर
सोचते हो वो ज़हर पी जायेगा?
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डॉ कविता'किरण'



Wednesday, September 15, 2010

कविताकिरण -नेपाल -यात्रा (एक रिपोर्ट)



दिनांक 7,8 9 सितंबर 2010 को काठमांडू में त्रिदिवसीय संगोष्ठी का आयोजन नेपाल,काठमांडू स्थित भारतीय राजदूतावास एवं भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित किया गया. इस संगोष्ठी का शुभारंभ हास्य कवि सम्मेलन से होना था.इस हास्य कवि सम्मेलन में सम्मलित होने वाले कवियों में हास्य कवि सम्राट सर्वश्री सुरेंद्र शर्मा, महेंद्र शर्मा, अरुण जैमिनी, दीपक गुप्ता,कविता"किरण",विवेक गौतम और नेपाली कवि सर्वश्री लक्ष्मण गाम्नागे और शैलेंद्र सिंखडा थे.इस हास्य कवि सत्र का उद्घाटन नेपाली राष्ट्रपति महामहिम डॉ. श्री रामवरण यादव द्वारा दीप प्रज्ज्व्लित करके किया गया. इस उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कुलपति प्रग्या प्रतिष्ठान के श्री बैरागी काइंला द्वारा की गई.स्वागत उपकुलपति श्री गंगा प्रसाद उप्रेती द्वारा किया गया. इस अवसर पर आमंत्रित विशिष्ट अतिथियों में नेपाली शिक्षा मंत्री, संस्कृति मंत्री और भारतीय राजदूत श्री राकेश सूद थे जिन्होंने आशीर्वचन और अपने-अपने उद्बोधन भाषण दिए.नेपाली राष्ट्रपति ने केवल इस मैत्रीपूर्ण हास्य कवि सम्मेलन के लिए भारतीय राजदूतावास काठमांडू और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद, नई दिल्ली को बधाई दी बल्कि उन्होंने अपने मंत्रियों के साथ हास्य का लुत्फ भी लिया.