Monday, October 26, 2009

रिश्ते!



रिश्ते!
गीली लकड़ी की तरह
सुलगते रहते हैं
सारी उम्र।
कड़वा कसैला धुँआ
उगलते रहते हैं।
पर कभी भी जलकर भस्म नही होते।
ख़त्म नही होते।
सताते हैं जिंदगी भर
किसी प्रेत की तरह!
**********************'तुम कहते हो तो'काव्य संग्रह में से


8 comments:

  1. waah ma'am.... kya paribhaasha di hai rishton ki....

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  2. बहुत बेहतरीन रचना...आप की अभिव्यक्ति बहुत दमदार है...बधाई...
    नीरज

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  3. कविता
    ब्‍लाग पर आने के लिए आभार। तुम्‍हारा ब्‍लाग भी आज ही देखा, उसके लिए भी बधाई। अच्‍छी अभिव्‍यक्ति है, रिश्‍ते कभी-कभी बहुत अच्‍छे भी होते हैं उनके बिना जीवन का रस ही नहीं आता। ऐसे में ही कभी उनका साथ छूटने लगे तब कलम बोल उठती है कि जीवन में सपने मत देखो। इसलिए मैंने लिखा था।

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  4. हमारे ब्लोग को लगत है आपके ब्लोग से इश्क हो गया है
    तभी तो जितना अपने ब्लोग पे नही लिख पाते उतना यहा लिख जाते है
    खैर भगवान दो ब्लोगो का प्रेम बनाये रखे
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/

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  5. कम शब्दों में बहुत सुन्दर कविता।
    बहुत सुन्दर रचना । आभार

    ढेर सारी शुभकामनायें.

    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  6. बहुत सही कहा आपने . रिश्ते केवल धुंआ उगलते लकड़ी होते है l

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  7. kisne kaha ke rishtey dhuan ugalte rehte hain. yeh to apna apna tariqa hai ke rishtey ko kis tarah nibhate hain.
    John

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