Monday, October 5, 2009

दोस्ती किस तरह निभाते हैं

दोस्ती किस तरह निभाते हैं
मेरे दुश्मन मुझे सिखाते हैं

नापना चाहते हैं दरिया को
वो जो बरसात में हाते हैं

ख़ुद से नज़रें मिला नही पाते
वो मुझे जब भी आजमाते हैं

जिंदगी क्या डराएगी उनको
मौत का जश्न जो मनाते हैं

ख्वाब भूले हैं रास्ता दिन में
रात जाने कहाँ बिताते हैं
--------------------------डॉ.कविता'किरण'
शेष 'तुम्ही कुछ कहो ना!' ग़ज़ल संग्रह में


12 comments:

  1. Peeda ko pran de diye apne isme toh.....ye kuch log hee samajh sakte hain ki...dard ka had se guzar jana hai dawa ho jane...umda

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  2. सारी कविता बहुत खुबसूरत है परन्तु आपसे खुबसूरत नहीं है.....................

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  3. क्या बात है। बेहद खूबसूरत व दिल से लिखी गयी रचना। बहुत-बहुत बधाई

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  4. उसकी बेकरारी को बस ये मन समझता है , बहुत खूब

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  5. हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

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  6. ye ek badhiyaa gazal hai jise baar baar padhne kaa man kartaa hai.

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  7. wah kiran ji maine to rat li ye kavita aapki

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  8. aapki khubhsurti ki tarah aapki kavitaye bhi sundar hai..........kavita ji

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  9. koi dost hai na RAकीब है,,,
    अब शहर कितने अजीब हैं
    मैं किसे कहूँ मेरे साथ चल, यहाँ सब के सर पे सलीब है !!

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